"ये घर बहुत हंसीन है होता है किसी ने बहुत सुंदर लिखा है गृहस्ती मैं कैसे होना चाहिए अगर ऐसी सोचो तो घर किसी का भी कभी ना बिगड़े गा देखे सुंदर कहानी को पढकर कितनी स्वार्थी है ना. एक पति की सोच रहा है अपनी पत्नी के विषय में देखे क्या सोच रहा है और उधर पत्नी क्या सोच रही है झगड़े के बाद मजााा आ जाएगा पढ़कर

"ये घर बहुत हंसीन है होता है किसी ने बहुत सुंदर लिखा है गृहस्ती मैं कैसे होना चाहिए अगर ऐसी सोचो तो घर किसी का भी कभी ना बिगड़े गा देखे सुंदर कहानी को पढकर
कितनी स्वार्थी है ना. एक पति की सोच रहा है अपनी पत्नी के विषय में देखे क्या सोच रहा है और उधर पत्नी क्या सोच रही है झगड़े के बाद मजााा आ जाएगा पढ़कर
पांच दिन होने को आए मजाल है जो लौट आए...
जरा सा तुनकबाजी कया हुई चली गई मायके ....
एकबार भी नही सोचा मेरे बारे ...कैसे रहूंगा कया खाउंगा.....
और ऊपर से प्याज... उफ आँसू बंद ही नही होते ..अब बनाऊं भी तो कया एक खिचड़ी ही बनानी आती है बस ...खिचड़ी खा खाकर खिचड़ी बन गई जिदंगी....लौट आओ यार सुधा लौट आओ ना....देखो ये घर घर नही बल्कि कबाडखाना बन गया है लौट आओ यार अब....मगर तुम्हें मेरी फिक्र हो तब ना...
मोहन कुछ गुस्से मे तो कुछ नाराज था कारण पिछले पांच दिन पहले उसका अपनी पत्नी सुधा से कुछ झगड़ा हो गया बात इतनी बड़ी की वो गुस्से मे मायके चली गई... बस तबसे उसका बुरा हाल था...
वहीं मायके मे सुधा बहाने बहाने कभी छत पर कभी किसी बहाने दरवाजा खोलकर देखती शायद अब मोहन आए शायद अब आए ...
और मन मे यही चल रहा था परसों दीवाली है घर का सफाई का कुछ ख्याल नही होगा ...अभी तक खिचड़ी से मन नही भरा होगा मे भी नही जाउंगी वापस खाओ अकेले खिचड़ी .....मगर सुबह की चाय नाश्ता कैसे करते होगे ...लंच चलो आँफिस कैंटीन से मगर डिनर वहीं खिचड़ी ...उफ आ ही जाते लेने मगर मजाल है आए....आ जाओ मोहन जी आ जाओ मन नही लगता आपके बिना .....अभी घर को कबाड़खाना बना दिया होगा 36 काम पडे होगे ...कया करुं ...
रमा ...मां बाजार गई है आए तो बता देना मे वापस जा रही हूं .....सुधा समान अटैची मे समेटते हुए छोटी बहन से बोली... 
रमा- पर दीदी ...आपका तो झगड़ा हुआ था जीजू से ...
आपने कहा था जबतक वो नही आएंगे तबतक नही जाओगी ...
सुधा- हां हां कहा था मगर घर हम दोनों पति पत्नी का है और ध्यान भी हमें ही रखना है ..अगर वो गर्म ही रहना चाहते है तो मुझे ठंडा हो जाना चाहिए ...मे चली ..
कहकर जैसे ही दरवाजा खोलकर बाहर को निकलने को हुई तो मोहन से टकरा गई ...सुधा- आप ...आ गए भर गया मन खिचड़ी खा खाकर ...देखो कैसे लग रहे हो..
मोहन- हां भर गया मन खिचड़ी खा खाकर ...अब चलो ..तुम्हारे बिना घर घर नही भूतबंगला लगता है जो हुआ सो हुआ गलती मेरी या तुम्हारी ...भूल जाओ ...
घर चलो दीवाली है परसों और बिना लक्ष्मी के कैसी दीवाली ...अभी बहुत काम करने है सफाई और मिठाई बांटनी है सब दोस्तों रिश्तेदारो मे ...अब अगर हम दोनों मे दोनों गर्म रहेंगे तो कैसे घर चलेगा ...ठीक है तुम गर्म रहो मै हो गया ठंडा ...चलो...
सुधा ने मुसकराते मोहन का हाथ पकडा और चल दिए दोनों अपना घर बसाने....
प्या्


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