21 अक्टूबर प्रथम भारतीय सर्वेक्षक पंडित नैन सिंह रावत के जन्मदिन पर विशेष महावीर संगल जी द्वारा

21 अक्तूबर/जन्म-दिवस प्रथम भारतीय सर्वेक्षक पंडित नैनसिंह रावत पर्वतीय क्षेत्र में सर्वेक्षण का काम बहुत कठिन है। आज तो इसके लिए अनेक सुविधाएं तथा वैज्ञानिक उपकरण उपलब्ध हैं; पर जब यह नहीं थे, तब सर्वेक्षण करना बहुत साहस एवं सूझबूझ का काम था। पंडित नैनसिंह रावत ऐसे ही एक व्यक्तित्व थे। अतः उनके काम को विश्व भर में मान्यता मिली। पंडित नैनसिंह का जन्म 21 अक्तूबर, 1830 को ग्राम मिलम (मुनस्यारी, उत्तराखंड) में श्री अमर सिंह के घर में हुआ था। उनके दादा श्री धामसिंह को कुमाऊं के राजा दीपचंद्र ने 1735 में कई गांवों की जागीर दी थी। घर चलाने के लिए वे अध्यापक बने, इसीलिए उनके नाम के साथ पंडित जुड़ गया। पंडित नैनसिंह भोटिया जनजाति में जन्मे थे। उन्होंने एक डायरी में अपने मिलपवाल गोत्र की उत्पत्ति धारानगर के क्षेत्री पंवार वंशियों से बताई है। अपने पिता के साथ व्यापार के लिए वे कई बार तिब्बत और लद्दाख की लम्बी यात्राओं पर गये। इससे यात्रा और अन्वेषण उनकी रुचि का विषय बन गया। उनकी इस प्रतिभा तथा साहसी स्वभाव का ब्रिटिश शासन ने पूरा उपयोग किया। कर्नल मांटगुमरी से सर्वेक्षण के नये उपकरणों का प्रशिक्षण लेकर उन्होंने 1865-66 में पहली यात्रा ल्हासा (तिब्बत) की ओर की। वे अल्मोड़ा से काठमांडू और वहां से तिब्बत पहुंचकर ब्रह्मपुत्र नदी के साथ-साथ चलते गये। ऊंचाई की गणना वे पानी उबलने में लगे समय तथा तापमान से करते थे। तारों तथा नक्षत्रों से वे भोगौलिक स्थिति तथा कदमों से दूरी नापते थे। यह आश्चर्य की बात है कि उनकी गणनाएं आज भी लगभग ठीक सिद्ध होती हैं। उन्होंने इस यात्रा की कठिनाइयों की चर्चा करते हुए लिखा है कि वहां के शासक अंग्रेजों या उनके कर्मचारियों तथा धरती की नाप के उपकरण देखकर भड़क जाते थे। अतः वे कभी व्यापारी तो कभी बौद्ध लामा की तरह ‘ॐ मणि पद्मे हुम्’ का जाप करते हुए वेश बदल-बदल कर यात्रा करते थे। 1867 में वे फिर तिब्बत गये। इस यात्रा में कई बार वे भटक गये और खाना तो दूर पानी तक नहीं मिला। यहां खान से सोना निकालने की विधि उन्होंने लिखी है। उनकी कई डायरियां अप्राप्य हैं। उनकी तीसरी यात्रा 1873-74 में यारकन्द खोतान की हुई। उन्होंने लिखा है कि वहां के बूढ़े मुसलमान 8-10 साल की कन्या से भी निकाह कर लेते हैं। कई बालिकाएं इससे मर जाती हैं। वहां पुरुष कई निकाह करते हैं और इसे प्रतिष्ठा की बात माना जाता है। पंडित नैनसिंह ने अपनी पांच प्रमुख यात्राओं में हर जगह की भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक स्थिति, भाषा-बोली, खेती, रीति-रिवाज आदि का अध्ययन किया और दुर्गम पुराने व्यापार मार्गों के मानचित्र बनाये। उन्होंने कई नदियों के उद्गम की खोज की। उनकी पुस्तक ‘अक्षांश दर्पण’ का वर्तमान सर्वेक्षक भी उपयोग करते हैं। उन्होंने नये सर्वेक्षकों को प्रशिक्षित भी किया। 1876 में उनका काम ‘राॅयल मैगजीन’ में प्रकाशित हुआ। 1877 में पेरिस के भूगोलशास्त्रियों ने उन्हें सोने की घड़ी देकर सम्मानित किया। ‘राॅयल ज्योग्राफिकल सोसायटी, लंदन’ ने 18 मई, 1877 को उन्हें स्वर्ण पदक देकर मध्य एशिया के क्यून ल्यून पहाड़ की एक अनाम शृंखला को ‘नैनसिंह रेंज’ नाम दिया। 1961 तक की ‘रीडर्स डाइजेस्ट एटलस’ में यह नाम मिलता है; पर फिर न जाने क्यों इसे बदलकर ‘नांगलौंग कांगरी’ कर दिया गया। 1877 में अवकाश प्राप्ति पर ब्रिटिश शासन ने उन्हें एक हजार रु0 तथा रुहेलखंड के तराई क्षेत्र में एक गांव पुरस्कार में दिया। 1895 में वहां पर ही घूमते समय हुए हृदयाघात से उनका देहांत हुआ। 27 जून, 2004 को भारत सरकार ने उनकी स्मृति में एक डाक टिकट जारी किया है। (संदर्भ : अंतरजाल पर उपलब्ध सामग्री) ----------------------- 21 अक्तूबर/पुण्य-तिथि दिल्ली में सत्याग्रह की शान बहिन सत्यवती 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय दिल्ली में जिस वीर महिला ने अपने साहस, संगठन क्षमता एवं अथक परिश्रम से चूल्हे-चौके तक सीमित रहने वाली घरेलू महिलाओं को सड़क पर लाकर ब्रिटिश शासन को हैरान कर दिया, उनका नाम था बहिन सत्यवती। सत्यवती का जन्म अपने ननिहाल ग्राम तलवन (जिला जालंधर, पंजाब) में 26 जनवरी, 1906 को हुआ था। स्वाधीनता सेनानी एवं परावर्तन के अग्रदूत स्वामी श्रद्धानंद जी उनके नाना थे। उनकी माता श्रीमती वेदवती धार्मिक एवं सामाजिक कार्याें में सक्रिय थीं। इस प्रकार साहस एवं देशभक्ति के संस्कार उन्हें अपने परिवार से ही मिले। विवाह के बाद वे दिल्ली में रहने लगीं। उनका विवाह दिल्ली क्लॉथ मिल में कार्यरत एक अधिकारी से हुआ, जिससे उन्हें एक पुत्र एवं पुत्री की प्राप्ति हुई। अपने पति से उन्हें दिल्ली के उद्योगों में कार्यरत श्रमिकों की दुर्दशा की जानकारी मिली। इससे उनका मातृत्व जाग उठा। वे श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए मैदान में कूद पड़ीं। इस प्रकार उन्होंने 1936-37 में दिल्ली में श्रमिक आंदोलन को एक नयी दिशा दी। उनके उग्र भाषणों से घबराकर शासन ने उन पर कई प्रतिबंध लगाये; पर वे पुलिस को चकमा देकर निर्धारित स्थान पर पहुंच जाती थीं। इससे दिल्ली की महिलाओं तथा युवाओं में उनकी विशेष पहचान बन गयी। हिन्दू क१लिज एवं इन्द्रप्रस्थ कन्या विद्यालय के छात्र-छात्राएं तो उनके एक आह्नान पर सड़क पर आ जाते थे। उन्होंने ‘कांग्रेस महिला समाज’ एवं ‘कांग्रेस देश सेविका दल’ की स्थापना की। वे ‘कांग्रेस समाजवादी दल’ की भी संस्थापक सदस्य थीं। नमक सत्याग्रह के समय उन्होंने शाहदरा के एक खाली मैदान में कई दिन तक नमक बनाकर लोगों को निःशुल्क बांटा। कश्मीरी गेट रजिस्ट्रार कार्यालय पर उन्होंने महिलाओं के साथ विशाल जुलूस निकाला। इस पर शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर अच्छे आचरण का लिखित आश्वासन एवं 5,000 रु0 का मुचलका मांगा; पर बहिन सत्यवती ने ऐसा करने से मना कर दिया। परिणाम यह हुआ कि उन्हें छह महीने के लिए कारावास में भेज दिया गया। उनके नेतृत्व में ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ का भी दिल्ली में बहुत प्रभाव हुआ; पर बार-बार की जेल यात्राओं से जहां एक ओर वे तपेदिक से ग्रस्त हो गयीं, वहां दूसरी ओर वे अपने परिवार और बच्चों की देखभाल भी ठीक से नहीं कर सकीं। उनकी बेटी ने दस वर्ष की अल्पायु में ही प्राण त्याग दिये। शासन ने पुत्री के अंतिम संस्कार के लिए भी उन्हें जेल से नहीं छोड़ा। 1942 के आंदोलन के समय बीमार होते हुए भी उन्होंने चांदनी चौक की गलियों में घूम-घूमकर महिलाओं के जत्थे तैयार किये और उन्हें स्वाधीनता के संघर्ष में कूदने को प्रेरित किया। शासन ने उन्हें गिरफ्तार कर अम्बाला जेल में बंद कर दिया। वहां उनकी देखभाल न होने से उनका रोग बहुत बढ़ गया। इस पर शासन ने उन्हें टी.बी चिकित्सालय में भर्ती करा दिया। जब वे जेल से छूटीं, तब तक आंदोलन ठंडा पड़ चुका था। लोगों की निराशा दूर करने के लिए उन्होंने महिलाओं एवं सत्याग्रहियों से संपर्क जारी रखा। यह देखकर शासन ने उन्हें घर पर ही नजरबंद कर दिया। रोग बढ़ जाने पर उन्हें दिल्ली के ही एक अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 21 अक्तूबर, 1945 को उनका देहांत हो गया। उनकी स्मृति को चिरस्थायी रखने के लिए दिल्ली में "सत्यवती कॉलेज" की स्थापना की गयी है। (संदर्भ : स्वतंत्रता सेनानी सचित्र कोश.. आदि) इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196


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