आज का विचार आत्म नदी गहरी भई सुख दुख दो किनारे रूपी स्वभाव

 आत्म नदी गहरी भई सुख-दुख दो  स्वभाव


 पुण्य पाप दो किनारे फसी जिसमें खुद को भूलत जात द्वंद बीच साईं बसे  उसको ढूंढत नाए जैसे नट रस्सी पर जब चलता है जब वह अदाएं बाय रूपी दोनों द्वंद से स्थिरता को प्राप्त होता है जैसे प्रकाश और अंधकार रूपी द्वंद को मध्य में खड़ा खुद जीव दोनों को जानता है प्रकाश रूपी पुण्य अंधकार रूपी पाप के चक्कर में खुद जो है जो इन दोनों को देख रहा है जिस खुदी को सूर्य प्रकाशित नहीं कर सकता और अंधकार गायब नहीं कर सकता परंतु मैं इन दोनों का जानने वाला होने पर भी मेरी दृष्टि कभी अपने पर नहीं जाती अधंकार और प्रकाश रूपी द्वंद मे  ही जीवन गवा देता है वह आत्मा तो द्वंद रूपी दो चादरो से अपने को ढाफं कर बैठा है कोई विरला ही भूत और भविष्य रूपी द्वंद के मध्य वर्तमान रूप से उसको पकड़ पाता है हरि ओम तत्सत

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