जाट गौरव महाराजा सूरजमल की जन्म जयंती पर विशेष महावीर संगल

 13 फरवरी/जन्म-दिवस



महाराजा सूरजमल जाट 


मुगलों के आक्रमण का प्रतिकार करने में उत्तर भारत में जिन राजाओं की प्रमुख भूमिका रही है, उनमें भरतपुर (राजस्थान) के महाराजा सूरजमल जाट का नाम बड़ी श्रद्धा एवं गौरव से लिया जाता है। उनका जन्म 13 फरवरी, 1707 में हुआ था। ये राजा बदनसिंह ‘महेन्द्र’ के दत्तक पुत्र थे। उन्हें पिता की ओर से वैर की जागीर मिली थी। वे शरीर से अत्यधिक सुडौल, कुशल प्रशासक, दूरदर्शी व कूटनीतिज्ञ थे। उन्होंने 1733 में खेमकरण सोगरिया की फतहगढ़ी पर हमला कर विजय प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने 1743 में उसी स्थान पर भरतपुर नगर की नींव रखी तथा 1753 में वहां आकर रहने लगे।



महाराजा सूरजमल की जयपुर के महाराजा जयसिंह से अच्छी मित्रता थी। जयसिंह की मृत्यु के बाद उसके बेटों ईश्वरी सिंह और माधोसिंह में गद्दी के लिए झगड़ा हुआ। सूरजमल बड़े पुत्र ईश्वरी सिंह के, जबकि उदयपुर के महाराणा जगतसिंह छोटे पुत्र माधोसिंह के पक्ष में थे। 


मार्च 1747 में हुए संघर्ष में ईश्वरी सिंह की जीत हुई। आगे चलकर मराठे, सिसौदिया, राठौड़ आदि सात प्रमुख राजा माधोसिंह के पक्ष में हो गये। ऐसे में महाराजा सूरजमल ने 1748 में 10,000 सैनिकों सहित ईश्वरी सिंह का साथ दिया और उसे फिर विजय मिली। इससे महाराजा सूरजमल का डंका सारे भारत में बजने लगा।


मई 1753 में महाराजा सूरजमल ने दिल्ली और फिरोजशाह कोटला पर अधिकार कर लिया। दिल्ली के नवाब गाजीउद्दीन ने फिर मराठों को भड़का दिया। अतः मराठों ने कई माह तक भरतपुर में उनके कुम्हेर किले को घेरे रखा। यद्यपि वे पूरी तरह उस पर कब्जा नहीं कर पाये और इस युद्ध में मल्हारराव का बेटा खांडेराव होल्कर मारा गया। आगे चलकर महारानी किशोरी ने सिंधियाओं की सहायता से मराठों और महाराजा सूरजमल में संधि करा दी।


उन दिनों महाराजा सूरजमल और जाट शक्ति अपने चरमोत्कर्ष पर थी। कई बार तो मुगलों ने भी सूरजमल की सहायता ली। मराठा सेनाओं के अनेक अभियानों में उन्होंने ने बढ़-चढ़कर भाग लिया; पर किसी कारण से सूरजमल और सदाशिव भाऊ में मतभेद हो गये। इससे नाराज होकर वे वापस भरतपुर चले गये। 


14 जनवरी, 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा शक्तियांे का संघर्ष अहमदशाह अब्दाली से हुआ। इसमें एक लाख में से आधे मराठा सैनिक मारे गये। मराठा सेना के पास न तो पूरा राशन था और न ही इस क्षेत्र की उन्हें विशेष जानकारी थी। यदि सदाशिव भाऊ के महाराजा सूरजमल से मतभेद न होते, तो इस युद्ध का परिणाम भारत और हिन्दुओं के लिए शुभ होता।


इसके बाद भी महाराजा सूरजमल ने अपनी मित्रता निभाई। उन्होंने शेष बचे घायल सैनिकों के अन्न, वस्त्र और चिकित्सा का प्रबंध किया। महारानी किशोरी ने जनता से अपील कर अन्न आदि एकत्र किया। ठीक होने पर वापस जाते हुए हर सैनिक को रास्ते के लिए भी कुछ धन, अनाज तथा वस्त्र दिये। अनेक सैनिक अपने परिवार साथ लाए थे। उनकी मृत्यु के बाद सूरजमल ने उनकी विधवाओं को अपने राज्य में ही बसा लिया। उन दिनों उनके क्षेत्र में भरतपुर के अतिरिक्त आगरा, धौलपुर, मैनपुरी, हाथरस, अलीगढ़, इटावा, मेरठ, रोहतक, मेवात, रेवाड़ी, गुड़गांव और मथुरा सम्मिलित थे। 


मराठों की पराजय के बाद भी महाराजा सूरजमल ने गाजियाबाद, रोहतक और झज्जर को जीता। वीर की सेज समरभूमि ही है। 25 दिसम्बर, 1763 को नवाब नजीबुद्दौला के साथ हुए युद्ध में गाजियाबाद और दिल्ली के मध्य हिंडन नदी के तट पर महाराजा सूरजमल ने वीरगति पायी। उनके युद्धों एवं वीरता का वर्णन सूदन कवि ने ‘सुजान चरित्र’ नामक रचना में किया है। 


(संदर्भ : विकीपीडिया)

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13 फरवरी/जन्म-दिवस


परमंहस बाबा राममंगलदास


बाबा राममंगलदास उच्च कोटि के एक सिद्ध महात्मा थे। उनके मन में श्रीराम और श्री अयोध्या जी के प्रति अत्यधिक अनुराग था। उनका जन्म 13 फरवरी, 1893 को ग्राम ईसरबारा, जिला सीतापुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। पुत्र तथा पत्नी के अल्प समय में ही वियोग के कारण इनका मन संसार से विरक्त हो गया। अतः ये घर छोड़कर अयोध्या आ गये।


उन दिनों अयोध्या में एक सिद्ध सन्त बेनीमाधव जी रहते थे। राममंगलदास जी उनसे दीक्षा लेकर उनके बताये मार्ग से साधना करने लगे। कड़ी धूप में या भूसे के ढेर में गले तक बैठकर ये जप करते थे। कहते हैं कि हनुमान् जी ने इन्हें दर्शन दिये थे। इनके गुरुजी ने इनसे कहा कि अयोध्या प्रभु श्रीराम जी का घर है, अतः तुम यहाँ किसी से एक इ॰च भूमि दान में मत लेना। मृत्यु के समय तुम्हारे पास एक पैसा भी नहीं निकलना चाहिए। बाबा राममंगलदास जी ने उनकी आज्ञा का अक्षरशः पालन किया।


बाबा जी ने शास्त्रों का गहन अध्ययन किया। उन्हें खेचरी विद्या सिद्ध थी। वे निर्धन-धनवान, स्त्री-पुरुष तथा सब धर्म वालों को एक दृष्टि से देखते थे तथा निर्धनों को सदा अन्न-वस्त्र वितरण करते रहते थे। आयुर्वेदिक दवा एवं जड़ी-बूटियों से उन्होंने कई असाध्य रोगियों को ठीक किया। दवा के साथ वे उन्हें श्रीराम नाम का जप करने को कहते थे। उनकी मान्यता थी कि लाभ तो जप से होता है, दवा उसमें कुछ सहायता अवश्य करती है।


एक बार एक महाशय आये और बोले, मैं किसी विद्वान से प्रभु चर्चा करना चाहता हूँ। बाबा जी ने कहा कि अयोध्या में सब विद्वान हैं, आप चाहे जिससे चर्चा कर लें। इसी समय उनका एक सेवक वहाँ आ गया। बाबा जी ने उन सज्जन से कहा कि फिलहाल आप इसी से चर्चा करें। इतना कहकर उन्होंने सेवक के सिर पर हाथ रखा। इसके बाद तो उस सेवक ने उन महाशय की सब शंकाओं का शास्त्रीय समाधान कर दिया। उन विद्वान सज्जन का अहंकार गल गया और वे बाबा जी के चरणों में गिर पड़े।


बाबा जी को अनेक सिद्धियाँ प्राप्त थीं, पर वे उनका प्रदर्शन नहीं करते थे। उन्होंने निद्रा को जीत लिया था। वे कई वर्ष बिना सोये रहे। उन्हें अदृश्य होने की विद्या भी प्राप्त थी। प्रायः वे कहते थे कि माता-पिता की सेवा ईश्वर-सेवा से भी अधिक फलदायी है। असहाय, दीन-हीन और बीमार प्राणी की निःस्वार्थ सेवा से भगवान की प्राप्ति हो सकती है। 


बाबा जी के दर्शन करने के लिए दूर-दूर से सन्त, महात्मा तथा गृहस्थ जन आते थे। वे सबको राम-नाम जपने का उपदेश देते थे। उनका जीवन बहुत सादा था। वे सदा बिना बिछौने की चौकी पर बैठते और सोते थे। अपने शरीर की उन्होंने कभी चिन्ता नहीं की। प्रभु को भोग लगाकर वे सूखी रोटी और दाल प्रसाद रूप में ग्रहण करते थे। कितना भी कष्ट हो; पर वे सदा प्रसन्न ही रहते थे। यह उनका स्वभाव बन गया था।


वे कहते थे कि साधु का आचरण मर्यादित और त्यागमय होना चाहिए। वे आचरण की पवित्रता को सबसे बड़ी साधना मानते थे। 31 दिसम्बर, 1984 को परमहंस बाबा राममंगलदास जी ने श्री अयोध्या धाम में ही अपनी लीला समेट ली। बाबा द्वारा रचित ‘भक्त-भगवन्त चरितावली एवं चरितामृत’ नामक ग्रन्थ की गणना अध्यात्म क्षेत्र के महान् ग्रन्थ के रूप में की जाती है।

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13 फरवरी/पुण्य-तिथि


अल्पाहारी व अल्पभाषी वसंतराव केलकर


वसंतराव केलकर कोल्हापुर (महाराष्ट्र) के निवासी थे। यों तो उनका पूरा नाम दिगम्बर गोपाल केलकर था; पर यह नाम केवल विद्यालय के प्रमाण पत्रों तक ही सीमित रहा। उनके पिताजी कोल्हापुर में पुरोहित थे। उनके साथ वसंतराव भी कभी-कभी जाते थे। संघ से संपर्क होने के बाद ऐसे पोथीवाचन और भोजन से मिलने वाली दक्षिणा राशि को वे गुरुदक्षिणा में अर्पण कर देते थे। 


कोल्हापुर से बी.ए. कर दो-तीन वर्ष तक उन्होंने अपने एक मित्र के टूरिंग टाकीज में काम किया। फिर उन्होंने पुणे से बी.कॉम. की परीक्षा दी और 1955 में प्रचारक बन गये। छात्र जीवन में भी खेलकूद और मौज-मस्ती के बदले पठन-पाठन, चिंतन और रामायण-महाभारत आदि पौराणिक ग्रंथ पढ़ने में उनकी अधिक रुचि थी। प्रचारक जीवन में भी उनका यह स्वभाव बना रहा। इन धर्मग्रन्थों में से टिप्पणियां तैयार कर उन्होंने कई पुस्तकें भी बनाईं।


दो वर्ष चिपलूण तहसील प्रचारक रहने के बाद वे पांच साल रत्नागिरि जिला और फिर अगले पांच साल कोल्हापुर विभाग प्रचारक रहे। इसके बाद कई वर्ष वे महाराष्ट्र के सहप्रांत प्रचारक रहे। 1990 से 92 तक उनका स्वास्थ्य खराब रहा। ठीक होने पर 1992 से 97 तक वे गुजरात और महाराष्ट्र के क्षेत्र प्रचारक रहे; पर एक बार फिर उनका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। पहले उंगलियां और फिर पूरा बायां हाथ ही लकवाग्रस्त हो गया। इसका उनके मन और मस्तिष्क पर भी असर पड़ा और वे एक बार फिर दायित्वमुक्त हो गये।


कम बोलने और कम खाने वाले वसंतराव का जीवन बड़ा नियमित था। वे प्रतिदिन योगाभ्यास व ध्यान करते थे। रेल में यात्रा करते समय अपनी बर्थ पर भी वे कुछ आसन कर लेते थे। पढ़ने में रुचि होने के कारण उन्होंने आयुर्वेद, होम्योपैथी, एक्यूप्रेशर, एक्यूपंक्चर और प्राकृतिक चिकित्सा की कई पुस्तकें पढ़ीं और उनके प्रयोग स्वयं पर किये। 


उनकी वाणी बहुत मधुर थी; पर हस्तलेख खराब होने के कारण वे पत्र-व्यवहार बहुत कम करते थे। कहीं भी बौद्धिक देने से पूर्व वे उसकी अच्छी तैयारी करते थे। उनके बौद्धिक में अंग्रेजी और संस्कृत के उद्धरणों के साथ ही गीत की कुछ पंक्तियां भी शामिल रहती थीं। 


आपातकाल में पुलिस उन्हें पकड़ नहीं सकी। भूमिगत रहकर सत्याग्रह का उन्होंने सफल संचालन किया। आपातकाल के बाद वे पूर्ववत संघ के काम में लग गये। शाखा के लिए उनके मन में अतीव श्रद्धा थी। छात्र जीवन में एक प्रतिज्ञा कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि जब इसे आजीवन निभाने की मानसिकता होगी, तब ही प्रतिज्ञा लूंगा, और उन्होंने कुछ समय बाद ही प्रतिज्ञा ली। 


प्रवास संघ कार्य का प्राण है। अतः वे किसी भी परिस्थिति में इसे स्थगित नहीं करते थे। 1974 में महाराष्ट्र के सभी गांव और घरों तक शिवसंदेश पत्रिका पहुंचाने तथा 1983 में पुणे के पास तलजाई में सम्पन्न हुए अति भव्य प्रांतीय शिविर के लिए उन्होंने अथक परिश्रम किया।


स्वास्थ्य लाभ के लिए वे पुणे, दापोली, डोंबिवली, लातूर आदि में रहे; पर ईश्वर की इच्छानुसार 13 फरवरी, 2001 को उनका देहांत हो गया। जिन दिनों वे रत्नागिरि में जिला प्रचारक थे, तब वहां के कार्यकर्ताओं ने उनसे कहा कि प्रचारक जीवन से निवृत्त होकर आप यहीं रहें। वसंतराव की स्वीकृति होने पर उन्होंने दापोली में एक मैडिकल स्टोर खोलकर उसे चलाने की जिम्मेदारी एक कार्यकर्ता को दे दी। यह स्टोर बहुत सफल हुआ। वसंतराव की इच्छानुसार उनके देहांत के बाद उससे प्राप्त 11 लाख रु0 का लाभांश प्रांत संघचालक, कार्यवाह और प्रचारक के सुझाव पर डा0 हेडगेवार स्मारक निधि में दे दिया गया।


(संदर्भ : राष्ट्रसाधना भाग दो)

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13 फरवरी/जन्म-दिवस


भारत कोकिला सरोजिनी नायडू


1917 से 1947 तक स्वाधीनता समर के हर कार्यक्रम में सक्रिय रहने सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी, 1879 को भाग्यनगर (हैदराबाद, आंध्र प्रदेश) में हुआ था। वे आठ भाई-बहिनों में सबसे बड़ी थीं। उनके पिता श्री अघोरनाथ चट्टोपाध्याय वहां के निजाम कॉलेज में रसायन वैज्ञानिक तथा माता श्रीमती वरदा सुन्दरी बंगला में कविता लिखती थीं। इसका प्रभाव सरोजिनी पर बालपन से ही पड़ा और वह भी कविता लिखने लगी।


उनके पिता चाहते थे कि वह गणित में प्रवीण बने; पर उनका मन कविता में लगता था। बुद्धिमान होने के कारण उन्होंने 12 वर्ष में ही कक्षा 12 की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। मद्रास विश्वविद्यालय की प्रवेश परीक्षा में उन्हें जितने अंक मिले, उतने तब तक किसी ने नहीं पाये थे। 13 वर्ष की अवस्था में उन्होंने अंग्रेजी में 1,300 पंक्तियों की कविता ‘झील की रानी’ तथा एक नाटक लिखा। उनके पिता ने इन कविताओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित कराया। 


1895 में उच्च शिक्षा के लिए वे इंग्लैंड गयीं। वहां भी पढ़ाई और काव्य साधना साथ-साथ चलती रही। 1898 में सेना में कार्यरत चिकित्सक डा0 गोविंद राजुलु नायडू से उनका विवाह हुआ। वे अंग्रेजी, हिन्दी, बंगला, गुजराती एवं तमिल की प्रखर वक्ता थीं। 1902 में कोलकाता में उनका ओजस्वी भाषण सुनकर श्री गोपाल कृष्ण गोखले ने उन्हें घर के एकान्त और काव्य जगत की कल्पनाओं से निकलकर सार्वजनिक जीवन में आने का सुझाव दिया।


1914 में इंग्लैंड में उनकी भेंट गांधी जी से हुई। वे उनके विचारों से प्रभावित होकर स्वाधीनता संग्राम में सक्रिय हो गयीं। एक कुशल सेनापति की भांति उन्होंने अपनी प्रतिभा का परिचय सत्याग्रह तथा संगठन दोनों क्षेत्रों में दिया।  उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी द्वारा संचालित आंदोलन में भी काम किया। भारत में भी उन्होंने कई आंदोलनों का नेतृत्व किया तथा जेल गयीं। गांव हो या नगर, वे हर जगह जाकर जनता को जाग्रत करती थीं।  


उन्हें युवाओं तथा महिलाओं के बीच भाषण देना बहुत अच्छा लगता था। अब तक महिलाएं अपने घर और परिवार तक सीमित रहने के कारण स्वाधीनता आंदोलन से दूर ही रहती थीं; पर सरोजिनी नायडू के सक्रिय होने से वातावरण बदलने लगा। वे अपने मधुर कंठ से सभाओं में देशभक्ति से पूर्ण कविताएं पढ़ती थीं। इस कारण लोग उन्हें ‘भारत कोकिला’ कहने लगे। जलियांवाला बाग कांड के बाद उन्होंने ‘कैसर-ए-हिन्द’ की उपाधि वापस कर दी। 


राजनीति में सक्रियता से उनकी पहचान राष्ट्रीय स्तर पर बन गयी। 1925 में कानपुर के कांग्रेस अधिवेशन में उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। इस प्रकार वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। साबरमती में एक स्वयंसेवक के नाते उन्होंने स्वाधीनता के प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किये थे। अतः गांधी जी उन पर बहुत विश्वास करते थे। 


1931 में लंदन में हुए दूसरे गोलमेज सम्मेलन में वे उन्हें भी प्रतिनिधि के नाते साथ ले गये थे। 1932 में जेल जाते समय आंदोलन को चलाते रहने का दायित्व उन्होंने सरोजिनी नायडू को ही दिया। ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ के समय वे गांधी जी के साथ आगा खां महल में बन्दी रहीं।


स्वाधीनता प्राप्ति के बाद नेहरू जी के आग्रह पर वे उत्तर प्रदेश की पहली राज्यपाल बनीं। इसी पद पर रहते हुए दो मार्च, 1949 को उनका देहांत हुआ। उन्होंने नारियों को जीवन के हर क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया। इस नाते उनका योगदान भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण है। 


(संदर्भ : विकीपीडिया एवं अंतरजाल पर उपलब्ध सामग्री)

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13 फरवरी/बलिदान-दिवस


हिन्दुत्व-प्रेमी रिक्शाचालक 


तमिलनाडु राज्य में एक समय हिन्दू धर्म विरोध की लहर बहुत प्रबल थी। वहां राजनीति ने समाज में भरपूर जातीय विभाजन पैदा किया है। अतः बड़ी संख्या में लोग हिन्दुत्व के प्रसार का अर्थ उत्तर भारत, हिन्दी तथा ब्राह्मणों के प्रभाव का प्रसार समझते थे। वहां ईसाई और इस्लामी शक्तियां भी राजनीति में काफी प्रभाव रखती थीं। पैसे की उनके पास कोई कमी नहीं थी। उनका हित भी इसी में था कि हिन्दू शक्तियां प्रभावी न हों।


लेकिन इस सबसे दूर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और हिन्दू मुन्नानी जैसे संगठन समाज के हर वर्ग को संगठित कर रहे थे। धीरे-धीरे उनका प्रभाव और काम बढ़ रहा था। मीनाक्षीपुरम् में हुए सामूहिक इस्लामीकरण से सभी जाति और वर्ग के हिन्दुओं के मन उद्वेलित हो उठे। वे इस माहौल को बदलना चाहते थे। ऐसे समय में हिन्दू संगठनों ने पूरे राज्य में बड़े स्तर पर हिन्दू सम्मेलन आयोजित किये। इनमें जातिभेद से ऊपर उठकर हजारों हिन्दू एकता और धर्मरक्षा की शपथ लेते थे। इससे हिन्दू विरोधी राजनेताओं के साथ ही इस्लामी और ईसाई शक्तियों के पेट में दर्द होने लगा।


इसी क्रम में 13 फरवरी, 1983 को कन्याकुमारी जिले के नागरकोइल में एक विशाल हिन्दू सम्मेलन रखा गया। इसका व्यापक प्रचार-प्रसार देखकर आठ फरवरी को ‘क्रिश्चियन डैमोक्रेटिक फ्रंट’ के नेता जिलाधिकारी से मिले और इस सम्मेलन पर प्रतिबंध लगाने को कहा; पर जिलाधिकारी नहीं माने। उन्होंने सावधानी के लिए सम्मेलन के नेताओं को बुलाकर नारे, शोभायात्रा तथा अन्य व्यवस्थाओं पर चर्चा की, जिससे वातावरण ठीक रहे। आयोजकों ने उन्हें हर तरह के सहयोग का आश्वासन दिया। 


लेकिन ईसाई नेताओं ने हार नहीं मानी। उन्होंने ऊपर से राज्य शासन का दबाव जिलाधिकारी पर डलवाया। अतः अचानक बिना किसी पूर्व सूचना के 11 फरवरी की आधी रात में पूरे जिले में धारा 144 लगाकर हिन्दू नेताओं की धरपकड़ शुरू कर दी गयी। 12 फरवरी को हिन्दू मुन्नानी के अध्यक्ष श्री थानुलिंग नाडार सहित 56 नेता पकड़ लिये गये। नागरकोइल में आने वाले हर व्यक्ति की तलाशी होने लगी। सम्मेलन में आ रहे वाहनों को 10 कि.मी. दूर ही रोक दिया गया। फिर भी हजारों लोग प्रतिबंध तोड़कर शहर में आ गये। 


13 फरवरी को 1,500 लोगों ने गिरफ्तारी दी। फिर भी लगातार लोग आ रहे थे। सम्मेलन में 30,000 लोगों के आने की संभावना थी। इतने लोगों को गिरफ्तार करना असंभव था। अतः शासन ने सम्मेलन के नेताओं से आग्रह किया कि वे ही लोगों को वापस जाने को कहें; पर उनकी अपील से पहले ही पुलिस ने लाठी और गोली बरसानी प्रारम्भ कर दी। सैकड़ों लोगों ने सम्मेलन स्थल के पास नागराज मंदिर में शरण ली। पुलिस ने वहां भी घुसकर उन्हें पीटा। कई लोगों के हाथ-पैर टूट गये; पर पुलिस को दया नहीं आयी। 


कुमार नामक एक युवा रिक्शाचालक से यह सब अत्याचार नहीं देखा गया। उसने पुलिस को खुली चुनौती दी कि या तो उसे गिरफ्तार कर लें या गोली मार दें। पुलिस के सिर पर खून सवार था। उसने उस निर्धन रिक्शाचालक को बहुत पास से ही गोली मार दी। वह ‘ॐ काली जय काली’ का उद्घोष करता हुआ वहीं गिर गया और प्राण त्याग दिये। 


शीघ्र ही यह समाचार पूरे राज्य में फैल गया। लोग राज्य सरकार पर थू-थू करने लगे। इस घटना से हिन्दुओं में नयी चेतना जाग्रत हुई। उन्होंने निश्चय किया कि अब वे अपमान नहीं सहेंगे और अपने अधिकारों का दमन नहीं होने देंगे। अतः इसके बाद होने वाले सभी हिन्दू सम्मेलन और अधिक उत्साह से सम्पन्न हुए। इस प्रकार नागरकोइल के उस निर्धन रिक्शाचालक का बलिदान तमिलनाडु के हिन्दू जागरण के इतिहास में निर्णायक सिद्ध हआ।


(संदर्भ : कृ.रू.सं.दर्शन, भाग छह)

-----------------------------------------------इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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