स्वतंत्रता के महान नायक वासुदेव बलवंत फड़के लहूजी सावले बलिदान दिवस पर विशेष महावीर संगल

 17 फरवरी/बलिदान-दिवस



सह्याद्रि का शेर वासुदेव बलवंत फड़के


बात 1870 की है। एक युवक तेजी से अपने गाँव की ओर भागा जा रहा था। उसके मुँह से माँ-माँ....शब्द निकल रहे थे; पर दुर्भाग्य कि उसे माँ के दर्शन नहीं हो सके। उसका मन रो उठा। लानत है ऐसी नौकरी पर, जो उसे अपनी माँ के अन्तिम दर्शन के लिए भी छुट्टी न मिल सकी। 


वह युवक था वासुदेव बलवन्त फड़के। लोगों के बहुत समझाने पर वह शान्त हुआ; पर माँ के वार्षिक श्राद्ध के समय फिर यही तमाशा हुआ और उसे अवकाश नहीं मिला। अब तो उनका मन विद्रोह कर उठा। उनका जन्म चार नवम्बर, 1845 को ग्राम शिरढोण (पुणे) में हुआ था। उनके पूर्वज शिवाजी की सेना में किलेदार थे; पर इन दिनों वे सब किले अंग्रेजों के अधीन थे। 


छोटी अवस्था में ही वासुदेव का विवाह हो गया। शिक्षा पूर्णकर उन्हें सरकारी नौकरी मिल गयी; पर स्वाभिमानी होने के कारण वे कहीं लम्बे समय तक टिकते नहीं थे। महादेव गोविन्द रानडे तथा गणेश वासुदेव जोशी जैसे देशभक्तों के सम्पर्क में आकर फड़के ने ‘स्वदेशी’ का व्रत लिया और पुणे में जोशीले भाषण देने लगे। 


1876-77 में महाराष्ट्र में भीषण अकाल और महामारी का प्रकोप हुआ। शासन की उदासी देखकर उनका मन व्यग्र हो उठा। अब शान्त बैठना असम्भव था। उन्होंने पुणे के युवकों को एकत्र किया और उन्हें सह्याद्रि की पहाड़ियों पर छापामार युद्ध का अभ्यास कराने लगे। हाथ में अन्न लेकर ये युवक दत्तात्रेय भगवान की मूर्ति के सम्मुख स्वतन्त्रता की प्रतिज्ञा लेते थे। 


वासुदेव के कार्य की तथाकथित बड़े लोगों ने उपेक्षा की; पर पिछड़ी जाति के युवक उनके साथ समर्पित भाव से जुड़ गये। ये लोग पहले शिवाजी के दुर्गों के रक्षक होते थे; पर अब खाली होने के कारण चोरी-चकारी करने लगे थे। मजबूत टोली बन जाने के बाद फड़के एक दिन अचानक घर पहुँचे और पत्नी को अपने लक्ष्य के बारे में बताकर उससे सदा के लिए विदा ले ली।


स्वराज्य के लिए पहली आवश्यकता शस्त्रों की थी। अतः वासुदेव ने सेठों और जमीदारों के घर पर धावा मारकर धन लूट लिया। वे कहते थे कि हम डाकू नहीं हैं। जैसे ही स्वराज्य प्राप्त होगा, तुम्हें यह धन ब्याज सहित लौटा देंगे। कुछ समय में ही उनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी। लोग उन्हें शिवाजी का अवतार मानने लगे; पर इन गतिविधियों से शासन चौकन्ना हो गये। उसने मेजर डेनियल को फड़के को पकड़ने का काम सौंपा।


डेनियल ने फड़के को पकड़वाने वाले को 4,000 रु0 का पुरस्कार घोषित किया। अगले दिन फड़के ने उसका सिर काटने वाले को 5,000 रु0 देने की घोषणा की। एक बार पुलिस ने उन्हें जंगल में घेर लिया; पर वे बच निकले। अब वे आन्ध्र की ओर निकल गये। वहा भी उन्होंने लोगों को संगठित किया; पर डेनियल उनका पीछा करता रहा और अन्ततः वे पकड़ लिये गये।


उन्हें आजीवन कारावास की सजा देकर अदन भेज दिया गया। मातृभूमि की कुछ मिट्टी अपने साथ लेकर वे जहाज पर बैठ गये। जेल में अमानवीय उत्पीड़न के बाद भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। एक रात में वे दीवार फाँदकर भाग निकले; पर पुलिस ने उन्हेें फिर पकड़ लिया। अब उन पर भीषण अत्याचार होने लगे। उन्हें क्षय रोग हो गया; पर शासन ने दवा का प्रबन्ध नहीं किया। 


17 फरवरी, 1883 को इस वीर ने शरीर छोड़ दिया। मृत्यु के समय उनके हाथ में एक पुड़िया मिली, जिसमें भारत भूमि की पावन मिट्टी थी।



17 फरवरी/पुण्य-तिथि





सशस्त्र क्रान्ति के नायक लहूजी साल्वे


स्वतन्त्रता के संघर्ष में जिन वीरों ने अपनी प्राणाहुति दी, उनमें से अनेक ऐसे हैं, जिनके नाम और काम प्रायः अल्पज्ञात ही हैं। ऐसे ही एक वीर थे लहूजी साल्वे। महात्मा ज्योतिबा फुले, लोकमान्य तिलक तथा महान क्रान्तिवीर वासुदेव बलवन्त फड़के ने भी लहूजी के कार्यों से प्रेरणा ली थी। 


लहूजी का जन्म 14 नवम्बर, 1794 को एक स्वराज्यनिष्ठ परिवार में हुआ था। अतः लहूजी को माँ के दूध के साथ ही स्वराज्य का पाठ भी पढ़ने को मिला। उनके पिता का नाम राघोजी और माता का नाम विठाबाई था। वे पुणे के पास पुरन्दर किले की तलहटी में बसे पेठ गाँव के निवासी थे। 


यह क्षेत्र शिवाजी और उनके साथियों द्वारा हिन्दू साम्राज्य के लिए किये गये प्रयत्नों का प्रत्यक्ष साक्षी था। लोग रात में चौपालों पर शिवाजी के शौर्य, पराक्रम और विजय की गाथाएँ गाते थे। अतः अपने मित्रों के साथ खेलते हुए लहूजी को पग-पग पर स्वराज्य के लिए मर मिटने की प्रेरणा मिलती थी।


लहूजी के चेहरे पर जन्म के समय से ही एक अद्भुत लालिमा एवं तेज विद्यमान था। इस कारण नामकरण संस्कार के समय उनका नाम लहूजी रखा गया। राघोजी पेशवा की सेना में काम करते थे। उनके घर में भी अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्र विद्यमान थे। घर में युद्ध सम्बन्धी कथाओं की चर्चा प्रायः होती रहती थी। इसलिए लहूजी के मन में बचपन से ही शस्त्रों के प्रति प्रेमभाव उत्पन्न हो गया। वे घण्टों उनके सामने बैठे रहते थे।


उनकी इस रुचि को उनके पिता राघोजी ने और बढ़ाया। वे लहूजी को अपने साथ पहाड़ियों में ले जाकर अस्त्र-शस्त्र चलाना सिखाते थे। सबल शरीर के स्वामी लहूजी को पट्टा चलाने में विशेष महारत प्राप्त थी। इसके साथ ही उन्हें शिकार करने का भी शौक था। पशुओं का पीछा करते हुए कभी-कभी वे दूर तक निकल जाते थे; पर खाली हाथ लौटना उन्हें स्वीकार नहीं था। यह देखकर गाँव के अनुभवी बुजुर्ग लोग कहते थे कि यह बालक आगे चलकर निश्चित ही कुछ बड़ा काम करेगा।


1817 में पेशवा और अंग्रेजों में युद्ध हुआ। मराठा सेना ने पूरी शक्ति से युद्ध किया; पर भाग्य उनके विपरीत था। पेशवा ने पराजय के बाद पुणे छोड़ दिया। राघोजी युद्ध में बुरी तरह घायल हुए। फिर भी अंग्रेज सैनिकों ने उनका बहुत उत्पीड़न किया। इससे तड़प-तड़प कर राघोजी की मृत्यु हो गयी। यह सुनकर लहूजी ने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने का निश्चय कर लिया।


इस समय तक उनकी आयु 24 वर्ष की हो चुकी थी। उन पर विवाह करने का दबाव पड़ रहा था; पर लहूजी ने अपने लिए कुछ और काम ही निर्धारित कर लिया था। उन्होंने सह्याद्रि की पहाड़ियों में बसे गाँवों के युवकों को एकत्र कर उनकी एक मजबूत सेना बनायी। अस्त्र-शस्त्र एकत्र किये और अंग्रेज छावनियों पर धावा बोलना शुरू कर दिया। 


उनकी सेना में निर्धन और छोटी कही जाने वाली जातियों के युवक ही अधिक संख्या में थे। 1857 में अंग्रेजों के विरुद्ध जो सशस्त्र संघर्ष का लम्बा दौर प्रारम्भ हुआ, उसमें कानपुर, ग्वालियर और झाँसी के युद्धों में लहूजी के इन वीर सैनिकों ने अप्रतिम शौर्य दिखाया। 


जीवन भर अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्षरत रहे लहूजी साल्वे ने 17 फरवरी, 1881 को अन्तिम साँस ली।

...........................इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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