29 मार्च गुरु अंगद देव की पुण्यतिथि पर विशेष महावीर संगल

 29 मार्च/पुण्य-तिथि



सेवा और समर्पण के साधक गुरु अंगददेव


सिख पन्थ के दूसरे गुरु अंगददेव का असली नाम ‘लहणा’ था। उनकी वाणी में जीवों पर दया, अहंकार का त्याग, मनुष्य मात्र से प्रेम, रोटी की चिन्ता छोड़कर परमात्मा की सुध लेने की बात कही गयी है। वे उन सब परीक्षाओं में सफल रहे, जिनमें गुरु नानक के पुत्र और अन्य दावेदार विफल ह¨ गये थे।


गुरु नानक ने उनकी पहली परीक्षा कीचड़ से लथपथ घास की गठरी सिर पर रखवा कर ली। फिर गुरु जी ने उन्हें धर्मशाला से मरी हुई चुहिया उठाकर बाहर फेंकने को कहा। उस समय इस प्रकार का काम शूद्रों का माना जाता था। तीसरी बार मैले के ढेर में से कटोरा निकालने को कहा। गुरु नानक के दोनों पुत्र इस कार्य को करने के लिए तैयार नहीं हुए। 


इसी तरह गुरु जी ने लहणा को सर्दी की रात में धर्मशाला की टूटी दीवार बनाने को कहा। वर्षा और तेज हवा के बावजूद उन्होंने दीवार बना दी। गुरु जी ने एक बार उन्हें रात को कपड़े धोने को कहा, तो घोर सर्दी में रावी नदी पर जाकर उन्होंने कपड़े धो डाले। एक बार उन्हें शमशान में मुर्दा खाने को कहा, तो वे तैयार हो गये। इस पर गुरु जी ने उन्हें गले लगा कर कहा - आज से तुम मेरे अंग हुए। तभी से उनका नाम अंगददेव हो गया। 


गुरु अंगददेव का जन्म मुक्तसर, पंजाब में ‘मत्ते दी सराँ’ नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता का नाम फेरुमल और माता का दयाकौरि था। फेरुमल फारसी और बही खातों के विद्वान थे। कुछ वर्ष फिरोजपुर के हाकिम के पास नौकरी के बाद उन्होंने अपना व्यवसाय प्रारम्भ किया। 


15 वर्ष की अवस्था में लहणा का विवाह संघर (खडूर) के साहूकार देवीचन्द की पुत्री बीबी खीबी से हुआ। उनके परिवार में दो पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। बाबा फेरुमल हर वर्ष जत्था लेकर वैष्णो देवी जाते थे। कई बार लहणा भी उनके साथ गये। 


सन् 1526 में पिता की मृत्यु के बाद दुकान का भार पूरी तरह लहणा पर आ गया। अध्यात्म के प्रति रुचि होने के कारण एक दिन लहणा ने भाई जोधा के मुख से गुरु नानक की वाणी सुनी। वे इससे बहुत प्रभावित हुए। उनके मन में गुरु नानक के दर्शन की प्यास जाग गयी। वे करतारपुर जाकर गुरु जी से मिले। इस भेंट से उनका जीवन बदल गया। 


सात वर्ष तक गुरु नानक के साथ रहने के बाद उन्होंने गुरु गद्दी सँभाली। वे इस पर सितम्बर, 1539 से मार्च, 1552 तक आसीन रहे। उन्हांेने खडूर साहिब क¨ धर्म प्रचार का केन्द्र बनाया। सिख पन्थ के इतिहास में गुरु अंगददेव का विशिष्ट स्थान है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती गुरु नानक की वाणी और उनकी जीवनी को लिखा। 


उन दिनों हिन्दुओं में ऊँच-नीच, छुआछूत और जाति-पाँति के भेद अत्यधिक थे। गुरु अंगददेव ने लंगर की प्रथा चलाई, जिसमें सब एक साथ पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं। पश्चिम से होने वाले मुस्लिम आक्रमणों का पहला वार पंजाब को ही झेलना पड़ता था। इनसे टक्कर लेने के लिए गुरु अंगददेव ने गाँव-गाँव में अखाड़े खोलकर युवकों की टोलियाँ तैयार कीं। उन्होंने गुरुमुखी लिपि का निर्माण कर पंजाबी भाषा को समृद्ध किया। 


बाबा अमरदास को उन्होंने अपना उत्तराधिकारी बनाया, जिन्होंने उनकी वाणी को भी श्री गुरु ग्रन्थ साहब के लिए लिपिबद्ध किया। सेवा और समर्पण के अनुपम साधक गुरु अंगददेव 29 मार्च, 1552 को इस दुनिया से प्रयाण कर गये।

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29 मार्च/जन्म-दिवस


नयी कविता के प्रमुख हस्ताक्षर भवानी प्रसाद मिश्र


साहित्य के क्षेत्र में कविता सबसे प्राचीन एवं लोकप्रिय विधा है, चूँकि इसमें कम शब्दों में बड़ी बात कही जा सकती है। काव्य को अनुशासित रखने हेतु व्याकरण के आचार्यों ने छन्द शास्त्र का विधान किया है; पर छन्द की बजाय भावना को प्रमुख मानने वाले अनेक कवि इस छन्दानुशासन से बाहर जाकर कविताएँ लिखते हैं। इस विधा को ‘नयी कविता’ कहा जाता है।


नयी कविता के क्षेत्र में ‘भवानी भाई’ के नाम से प्रसिद्ध श्री भवानी प्रसाद मिश्र का नाम बड़े आदर से लिया जाता है। उनका जन्म 29 मार्च, 1913 को ग्राम टिकोरेया (होशंगाबाद, मध्य प्रदेश) में हुआ था। 


काव्य रचना की ओर उनका रुझान बचपन से था। छात्र जीवन में ही उनकी कविताएं पंडित ईश्वरी प्रसाद वर्मा की पत्रिका ‘हिन्दूपंच’ तथा श्री माखनलाल चतुर्वेदी की पत्रिका ‘कर्मवीर’ में छपने लगी थीं। 1930 से तो वे स्थानीय मंचों पर काव्य पाठ करने लगे; पर उन्हें प्रसिद्धि और उनकी कविता को धार जबलपुर में आकर मिली।


1942 में ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन के समय वे पौने तीन साल जेल में रहे। वहां उनका सम्पर्क मध्य प्रदेश के स्वाधीनता सेनानियों से हुआ। जेल से छूटकर 1946 में वे वर्धा के महिलाश्रम में शिक्षक हो गये। इसके बाद कुछ समय उन्होंने दक्षिण में ‘राष्ट्रभाषा प्रचार सभा’ का कार्य किया। फिर वे भाग्यनगर (हैदराबाद) से प्रकाशित प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका ‘कल्पना’ में सम्पादक हो गये। वैचारिक स्वतंत्रता के समर्थक होने के नाते 1975 में लगे आपातकाल का उन्होंने प्रतिदिन तीन कविताएं लिखकर विरोध किया। 


काव्य और लेखन में प्रसिद्ध होने के बाद उनका रुझान फिल्म लेखन की ओर हुआ; क्योंकि इससे बहुत जल्दी धन और प्रसिद्धि मिलती है। तीन वर्ष हैदराबाद में रहने के बाद वे मुम्बई और फिर चेन्नई गये, जहाँ उन्होंने फिल्मों में संवाद लेखन का कार्य किया; पर इसमें उन्हें बहुत यश नहीं मिला, अतः वे दिल्ली में आकाशवाणी से जुड़ गये। 1975 से पूर्व हुए आन्दोलन के समय उन्होंने बीमार होते हुए भी जयप्रकाश जी की कई सभाओं में भाग लिया।


दूसरे ‘तार सप्तक’ में प्रकाशित भवानी भाई के काव्य में शब्दों की सरलता और प्रवाह का अद्भुत सामंजस्य मिलता है। उन्होंने कई नये व युवा कवियों को आगे भी बढ़ाया। उनकी एक प्रसिद्ध कविता की पंक्तियाँ हैं -


जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख

और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।।


नर्मदा, विन्ध्याचल और सतपुड़ा से उन्हें बहुत स्नेह था। इस कारण प्रकृति की छाया उनकी रचनाओं में सर्वत्र दिखायी देती है। उन्होंने 12 काव्य संग्रहों का सृजन किया; जिसमें गीत फरोश, चकित है दुख, अंधेरी कविताएँ, गांधी पंचशती, खुशबू के शिलालेख, परिवर्तन के लिए, त्रिकाल सन्ध्या, अनाम तुम आते हो...आदि प्रमुख हैं। उन्होंने अनेक निबन्ध, संस्मरण तथा बच्चों के लिए तुकों के खेल जैसी पुस्तकें भी लिखीं। 


‘बुनी हुई रस्सी’ पर उन्हें 1972 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उ.प्र. हिन्दी संस्थान तथा मध्य प्रदेश शासन ने भी उन्हें शिखर सम्मानों से विभूषित किया।


पद्मश्री से सम्मानित भवानी भाई की हृदय रोग से पीडि़त होने के बाद भी सक्रियता कम नहीं हुई। कई वर्ष तक वे ‘पेसमेकर’ के सहारे काम चलाते रहे; पर 20 फरवरी, 1985 को अपने गृहनगर नरसिंहपुर में अपने पैतृक घर में ही भीषण हृदयाघात से उनका देहान्त हो गया।

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इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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