अमर शहीद वीरांगना अवंती बाई के बलिदान दिवस पर विशेष महावीर संगल

 20 मार्च/बलिदान-दिवस



वीरता की प्रतिमूर्ति अवन्तीबाई लोधी


मण्डला (म.प्र.) के रामगढ़ राज्य की रानी अवन्तीबाई ने एक बार राजा विक्रमजीत सिंह से कहा कि उन्होंने स्वप्न में एक चील को आपका मुकुट ले जाते हुए देखा है। ऐसा लगता है कि कोई संकट आने वाला है। राजा ने कहा, हाँ, वह संकट अंग्रेजों की ओर से आ रहा है; पर मेरी रुचि अब पूजापाठ में अधिक हो गयी है, इसलिए तुम ही राज संभालकर इस संकट से निबटो।


रानी एक बार मन्त्रियों के साथ बैठी कि लार्ड डलहौजी का दूत एक पत्र लेकर आया। उसमें लिखा था कि राजा के विक्षिप्त होने के कारण हम शासन की व्यवस्था के लिए एक अंग्रेज अधिकारी नियुक्त करना चाहते हैं। रानी समझ गयी कि सपने वाली चील आ गयी है। उसने उत्तर दिया कि मेरे पति स्वस्थ हैं। मैं उनकी आज्ञा से तब तक काम देख रही हूँ, जब तक मेरे बेटे अमानसिंह और शेरसिंह बड़े नहीं हो जाते। अतः रामगढ़ को अंग्रेज अधिकारी की कोई आवश्यकता नहीं है।


पर डलहौजी तो राज्य हड़पने का निश्चय कर चुका था। उसने अंग्रेज अधिकारी नियुक्त कर दिया। इसी बीच राजा का देहान्त हो गया। अब रानी ने पूरा काम सँभाल लिया। वह जानती थी कि देर-सबेर अंग्रेजों से मुकाबला होगा ही, अतः उसने आसपास के देशभक्त सामन्तों तथा रजवाड़ों से सम्पर्क किया। अनेक उनका साथ देने को तैयार हो गये। 


यह 1857 का काल था। नाना साहब पेशवा के नेतृत्व में अंग्रेजों को बाहर निकालने के लिए संघर्ष की तैयारी हो रही थी। रामगढ़ में भी क्रान्ति का प्रतीक लाल कमल और रोटी घर-घर घूम रही थी। रानी ने इस यज्ञ में अपनी आहुति देने का निश्चय कर लिया। उनकी तैयारी देखकर अंग्रेज सेनापति वाशिंगटन ने हमला बोल दिया।


रानी ने बिना घबराये खैरी गाँव के पास वाशिंगटन को घेर लिया। रानी के कौशल से अंग्रेजों के पाँव उखड़ने लगे। इसी बीच वाशिंगटन रानी को पकड़ने के लिए अपने घोड़े सहित रानी के पास आ गया। रानी ने तलवार के भरपूर वार से घोड़े की गरदन उड़ा दी। वाशिंगटन नीचे गिर पड़ा और प्राणों की भीख माँगने लगा। रानी ने दयाकर उसे छोड़ दिया।


पर 1858 में वह फिर रामगढ़ आ धमका। इस बार उसके पास पहले से अधिक सेना तथा रसद थी। उसने किले को घेर लिया; पर तीन महीने बीतने पर भी वह किले में प्रवेश नहीं कर सका। इधर किले में रसद समाप्त हो रही थी। अतः रानी कुछ विश्वासपात्र सैनिकों के साथ एक गुप्तद्वार से बाहर निकल पड़ी। इसी बीच किले के द्वार खोलकर भारतीय सैनिक अंग्रेजों पर टूट पड़े; पर वाशिंगटन को रानी के भागने की सूचना मिल गयी। वह एक टुकड़ी लेकर पीछे दौड़ा। देवहारगढ़ के जंगल में दोनों की मुठभेड़ हुई।


वह 20 मार्च, 1858 का दिन था। रानी ने काल का रूप धारण कर लिया; वह रणचण्डी बनकर शत्रुओं पर टूट पड़ी। अचानक एक फिरंगी के वार से रानी का दाहिना हाथ कट गया। तलवार छूट गयी। रानी समझ गयी कि अब मृत्यु निकट है। उसने जेल में सड़ने की अपेक्षा मरना श्रेयस्कर समझा। अतः एक झटके से अपने बायें हाथ से कमर से कटार निकाली और सीने में घोंप ली। अगले ही क्षण रानी का मृत शरीर घोड़े पर झूल गया।


भारतीय स्वतन्त्रता के गौरवशाली इतिहास में आज भी गढ़मण्डल की रानी अवन्तीबाई लोधी का नाम अमर है।

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20 मार्च/जन्म-दिवस


कलाप्रेमी संगठक डा. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव



लोगों को जोड़ना एक कठिन काम है, उसमें भी कलाकारों को जोड़ना तो और भी कठिन है; क्योंकि हर कलाकार के अपने नखरे और वैचारिक पूर्वाग्रह होते हैं। कई बार तो वे एक साथ मंच पर बैठना भी पंसद नहीं करते। फिर भी ‘संस्कार भारती’ के अध्यक्ष के नाते विविध विधाओं के नये, पुराने और स्थापित कलाकारों को जोड़ने का काम डा. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव ने पूरी शक्ति से किया। उनकी मान्यता थी कि कला का कोई रूप अछूता न रहे तथा सबके बारे में प्रामाणिक पुस्तकें प्रकाशित हों।


शैलेन्द्र जी का जन्म 20 मार्च, 1936 को हुआ था। बचपन में ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सम्पर्क में आ गये थे। शिक्षा पूर्ण कर वे अध्यापक बने और क्रमशः पटना वि.वि. में आचार्य, हिन्दी विभागाध्यक्ष तथा फिर भागलपुर वि.वि. के कुलपति पद पर काम किया। अध्यापन के साथ उनकी वि.वि. में चलने वाली सामाजिक गतिविधियों में भी काफी रुचि रहती थी। इसलिए वे पटना वि.वि. शिक्षक संघ के भी अध्यक्ष रहे। 


‘राष्ट्रीय सेवा योजना’ के अन्तर्गत वे स्वयं झाड़ू लेकर छात्रों के साथ सड़कों और नालियों की सफाई में जुट जाते थे। बिहार में प्रायः प्रतिवर्ष बाढ़ आती है। ऐसे में वे केवल भाषण ही नहीं देते थे, अपितु स्वयं सहायता सामग्री लेकर बाढ़ पीडि़त क्षेत्र में पहुँचकर ग्रामीणों की सेवा करते थे। 1974-75 में बिहार में हुए छात्र आन्दोलन में उन्होंने जयप्रकाश नारायण के साथ कन्धे से कन्धा मिलाकर संघर्ष किया। इस कारण आपातकाल में उन्हें जेल की यातनाएँ भी सहनी पड़ी। डा. शैलेन्द्र नाथ भाजपा के टिकट पर पटना शहर से एक बार विधायक तथा एक बार सांसद भी रहे।


अवकाश प्राप्ति के बाद उन्होंने अपना पूरा समय कलाकारों में राष्ट्रभाव जाग्रत करने वाली संस्था ‘संस्कार भारती’ को समर्पित कर दिया। उसके अध्यक्ष के नाते नौ साल तक उन्होंने देश के कोने-कोने में प्रवास किया। इस चक्कर में प्रायः वे अपने परिवार तक को उपेक्षित कर देते थे।


शैलेन्द्र जी को सभी भारतीय भाषाओं से प्रेम था; पर हिन्दी के प्रति मातृवत अनुराग होने के कारण वे उसे विश्व भाषा बनाना चाहते थे। उन्होंने कई ‘विश्व हिन्दी सम्मेलनों’ में भाग लिया। 1999 के लन्दन सम्मेलन में उन्हें शासन ने प्रतिनिधि नहीं बनाया, तो वे पत्नी सहित निजी खर्च पर वहाँ गये। हिन्दी दुनिया के अनेक देशों में बोली और समझी जाती है। अतः भाजपा शासन में उन्होंने विदेश मन्त्री यशवन्त सिन्हा को 10 जनवरी को ‘विश्व हिन्दी दिवस’ मनाने का सुझाव दिया, चूँकि 10 जनवरी, 1975 को नागपुर में पहला 'विश्व हिन्दी सम्मेलन' हुआ था। उनका यह सुझाव मान लिया गया। 


हिन्दी भाषा एवं समस्त भारतीय कलाओं के प्रति उनके समर्पण को देखकर शासन ने उन्हें ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। भाजपा के शासनकाल में कई बार उन्हें राज्यपाल बनाने की चर्चा हुई; पर वे एक मौन साधक की तरह संस्कार भारती के काम में ही लगे रहे। 


उन्होंने अनेक पुस्तकें लिखीं, जिनमें लोकनायक जयप्रकाश की जीवनी, लिफाफा देखकर (ललित निबन्ध), शिक्षा के नाम पर, कला संस्कृति और हम (निबन्ध संग्रह), बहुत दिनों के बाद (मुक्तक संग्रह), शब्द पके मन आँच पर, कलम उगलती आग (कविता संग्रह) प्रमुख हैं।


डा. शैलेन्द्रनाथ श्रीवास्तव 'चरैवेति-चरैवेति' के जीवन्त प्रतीक थे। 2006 ई. संस्कार भारती का ‘रजत जयन्ती वर्ष’ था। इस वर्ष में संगठनात्मक विस्तार के लिए उन्होंने व्यापक प्रवास का कार्यक्रम बनाया था; पर उसे पूरा करने से पहले ही 12 फरवरी, 2006 को वे अनन्त के प्रवास पर चले गये।

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20 मार्च/जन्म-दिवस



कलम के योद्धा मुजफ्फर हुसेन 


अपने लेखन से सत्य को उजागर करना बहुत कठिन काम है। वो भी एक कट्टर समुदाय के बीच; पर मुजफ्फर हुसेन ने जब कलम उठाई, तो फिर बिना डरे लगातार 50 साल तक इस धर्म का निष्ठा से पालन किया। 


उनका जन्म 20 मार्च, 1940 को म.प्र. के नीमच नगर में हुआ था।  उनके पिताजी वैद्य थे। बचपन से ही उनकी रुचि पढ़ने और लिखने में थी। जब वे 15 वर्ष के थे, तो उनके शहर में सरसंघचालक श्री गुरुजी का एक कार्यक्रम था। संघ विरोधी एक अध्यापक ने कुछ छात्रों से वहां परचे बंटवाएं। मुजफ्फर हुसेन भी उनमें से एक थे। कुछ कार्यकर्ताओं ने उन्हें पकड़ लिया। कार्यक्रम के बाद उन्हें गुरुजी के पास ले जाया गया। मुजफ्फर हुसेन सोचते थे कि उनकी पिटाई होगी; पर गुरुजी ने उन्हें प्यार से बैठाया, खीर खिलाई और कोई कविता सुनाने को कहा। मुजफ्फर हुसेन ने रसखान के दोहे सुनाए। इस पर श्री गुरुजी ने उन्हें आशीर्वाद देकर विदा किया। इस घटना से उनका मन बदल गया।


नीमच से स्नातक होकर वे कानून पढ़ने मुंबई आये और फिर यहीं के होकर रह गये। नीमच के एक अखबार में उनका लेख ‘कितने मुसलमान’ पढ़कर म.प्र. में कार्यरत वरिष्ठ प्रचारक श्री सुदर्शन जी उनसे मिले। सुदर्शन जी के गहन अध्ययन से वे बहुत प्रभावित हुए और उनके लेखन को सही दिशा मिली। अब वे जहां एक ओर हिन्दुत्व और राष्ट्रीयता के पुजारी हो गये, वहां इस्लाम की कुरीतियों और कट्टरता के विरुद्ध उनकी कलम चलने लगी। यद्यपि इससे नाराज मुसलमानों ने उन्हें धमकियां दीं; पर उन्होंने सत्य का पथ नहीं छोड़ा। 


आपातकाल में वे बुलढाणा और मुंबई जेल में रहे। लेखन ही उनकी आजीविका थी। हिन्दी, गुजराती, मराठी, उर्दू, अरबी, पश्तो आदि जानने के कारण उनके लेख इन भाषाओं के 24 पत्रों में नियमित रूप से छपते थे। मुस्लिम जगत की हलचलों की चर्चा वे अपने लेखों में विस्तार से करते थे। प्रखर वक्ता होने के कारण विभिन्न सभा, गोष्ठी तथा विश्वविद्यालयों में उनके व्याख्यान होते रहते थे। उनके भाषण तथ्य तथा तर्कों से भरपूर रहते थे। 


वे इस्लाम के साथ ही गीता और सावरकर साहित्य के भी अध्येता थे। शाकाहार एवं गोरक्षा के पक्ष में वे कुरान एवं हदीस के उद्धरण देते थे। वे मुसलमानों से कहते थे कि कुरान को राजनीतिक ग्रंथ की तरह न पढ़ें तथा भारत में हिन्दुओं से मिलकर चलें। वे देवगिरि समाचार (औरंगाबाद), तरुण भारत, पांचजन्य (दिल्ली) और विश्व संवाद केन्द्र, मुंबई से लगातार जुड़े रहे। वे मजहब के नाम पर लोगों को बांटने वालों की अच्छी खबर लेते थे। कई लोगों को लगता था कि कोई हिन्दू ही छद्म नाम से ये लेख लिखता है।


आगे चलकर सुदर्शन जी एवं इन्द्रेश जी के प्रयास से ‘मुस्लिम राष्ट्रीय मंच’ का गठन हुआ। श्री हुसेन की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे विद्याधर गोखले की संस्था ‘राष्ट्रीय एकजुट’ में भी सक्रिय थे। समाज और देशहित के किसी काम से उन्हें परहेज नहीं था। वर्ष 2002 में उन्हें ‘पद्मश्री’ तथा 2014 में महाराष्ट्र शासन द्वारा ‘लोकमान्य तिलक सम्मान’ से अलंकृत किया गया। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं। इनमें इस्लाम एवं शाकाहार, मुस्लिम मानसिकता, मुंबई के दंगे, अल्पसंख्यकवाद के खतरे, लादेन और अफगानिस्तान, समान नागरिक संहिता...आदि प्रमुख हैं। इनका कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है।



‘राष्ट्रीय उर्दू काउंसिल’ के अध्यक्ष के नाते उन्होंने राष्ट्रवादी सोच के कई लेखक तैयार किये। वे मुसलमानों के बोहरा समुदाय से सम्बद्ध थे। वहां भी उन्होंने सुधार के अभियान चलाये। मुस्लिम मानस एवं समस्याओं की उन्हें गहरी समझ थी। वे स्वयं नमाज पढ़ते थे; पर जेहादी सोच के विरुद्ध थे। 13 फरवरी, 2018 को मुंबई में ही कलम के इस योद्धा का निधन हुआ। 


(संदर्भ: पांचजन्य एवं आर्गनाइजर 25.2.18)

------------------------------------------------------------------------------------इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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