शरद पूर्णिमा चंद्रमा वैज्ञानिक महत्व लेखिका सुनीता कुमारी पूर्णिया बिहार

 आलेख-


शीर्षक-

शरद पूर्णिमा में चंद्रमा का महत्व व वैज्ञानिक दृष्टिकोण 


लेखिका-सुनीता कुमारी 

पूर्णियाँ बिहार 


यूँ तो हर महीने की पूर्णिमा का हिंदू धर्म में विशेष महत्व होता है।हर महीने की पूर्णिमा को अलग-अलग महत्त्व प्राप्त है परंतु, वर्ष के सभी पूर्णिमा में शरद पूर्णिमा का विशेष महत्व है ।कहते हैं कि ,इस दिन चंद्रमा की चांदनी से अमृत की वर्षा होती है जो आरोग्य प्रदान करने वाली होती है , स्वास्थ्यवर्धक होती है।

आश्विनी नक्षत्र में पड़ने वाली इस पूर्णिमा को शरद पूर्णिमाँ व अश्विनी नक्षत्र में पूर्णिमा होने के कारण इस माह का नाम अश्विन पड़ा है ।

हिंदू धर्म में शरद पूर्णिमा को विशेष महत्व प्राप्त है। पूरे देश में इस दिन चंद्रमा की पूजा का विधान है ।अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नाम एवं विधि से शरद पूर्णिमा मनाया जाता है। 

गुजरात में शरद पूर्णिमा की रात में रास रचाते हैं एवं लोग हर्षोल्लास के साथ डांडिया खेलते हैं।शरद पूर्णिमा की रात में गुजरात के विश्व प्रसिद्ध मंदिर सोमनाथ मंदिर में हजारों की संख्या में श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। ज्योतिर्लिंग श्री सोमनाथ महादेव मंदिर की छटा शरद पूर्णिमा की रात में अलौकिक और अद्भुत होती है। पूरा मंदिर चंद्रमा की दूधिया रोशनी से प्रकाशित होता है। जैसे दिन का उजाला हो ।  इस अलौकिक दृश्य में अपने आपको महादेव के करीब महसूस करते हैं ।भक्तों में भक्ति भाव महादेव के प्रति चरम सीमा पर होती है। आकाश में चंद्रमा के दर्शन करते हुए भक्तगण शिव के पंचाक्षरी मंत्र ओम नमः शिवाय का जाप करते हैं। गुजरात के सोमनाथ मंदिर का यह अलौकिक और अद्भुत दृश्य वर्ष में एक बार शरद पूर्णिमा के दिन होता है ।संभव हो तो इस दिन सोमनाथ मंदिर का दर्शन करना चाहिए ।

शरद पूर्णिमा के दिन पश्चिम बंगाल तथा उड़ीसा में भी महालक्ष्मी जी की पूजा की जाती है, जिसमें लखी पूजा ही कहा जाता है ।इस दिन पश्चिम बंगाल में नाना प्रकार के मिष्ठान व्यंजन का भोग लगाकर लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है एवं पूरे घर में दीपक जलाकर लक्ष्मी जी को प्रसन्न किया जाता है।पश्चिम बंगाल में शरद पूर्णिमा की रात दीवाली की रात जैसी होती है।

कहते हैं कि ,आदिदेव देव  महादेव एवं पार्वती के पुत्र कार्तिकेय का जन्म शरद पूर्णिमा के दिन ही हुआ था। इस दिन गौर वर्ण आकर्षक सुंदर वर की प्राप्ति हेतु उड़ीसा में इस दिन कुंवारी कन्या कार्तिकेय की पूजा करती हैं।

 शरद पूर्णिमा आरोग्य प्रदान करने वाला पूर्णिमा है ।

इस महीने में चंद्रमा सत्ताइस नक्षत्रों में भ्रमण करता है एवं ,पूर्णिमा के दिन चंद्रमा सोलह कलाओं से संपूर्ण होता है। शरद पूर्णिमाँ के दिन चंद्रमा पृथ्वी के सबसे निकट होता है ,एवं दूधिया रोशनी से चंद्रमा पूरी धरती को नहलाती है।

शरद पूर्णिमा आरोग्य प्रदान करने हेतु महत्वपूर्ण माना जाता है। आश्विन महीने में चंद्रमा सत्ताइस नक्षत्रों में भ्रमण करता है एवं पूर्णिमा के दिन सोलह कलाओं से परिपूर्ण होता है ।शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा पृथ्वी के सबसे नजदीक होता है एवं दूधिया रोशनी से पूरी धरती को नहलाता है।ऐसी मान्यता है कि,इस रात सभी को चाँद की रौशनी में बैठना चाहिए। 

 चंद्रमाँ को वेद पुराणों में मन का प्रतीक माना गया है। चंद्रमाँ मनसो जातः।

 वायु पुराण में चंद्रमा को जल का कारक बताया गया है। आयुर्वेदाचार्य वर्ष भर शरद पूर्णिमा का इंतजार करते हैं। जीवनदायिनी रोग नाशक जड़ी बूटियों को शरद पूर्णिमा की चांदनी में रखते हैं।

 ब्राह्मण पुराण के अनुसार चंद्रमा की सुधा से रोशनी जब धरती पर गिरती है तो औषधि की उत्पत्ति होती है। इन औषधियों को सोलह कलाओं से परिपूर्ण चंद्रमा की रोशनी प्राप्त होती है तो,इन औषधियों का गुण और बढ़ जाता है ।इसी कारण चंद्रमा को औषधियों का स्वामी कहा गया है।

शरद पूर्णिमा की रात चंद्रमा की दूधिया रोशनी में खीर एवं अन्य मिष्ठान का भोग लगाकर चंद्रमा की स्तुति की जाती है ,कहा जाता है कि इस रात चंद्र को भोग लगाने गये प्रसाद में चंद्रमा की रोशनी पढ़ने से औषधीय गुण आ जाते हैं,जो हमारे शरीर में पित्त का नाश करते है।

 हमारे स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होते हैं ।चंद्रमा की रोशनी में प्रसाद को रात भर या दो-तीन घंटे तक छोड़ देने से उसमें औषधीय गुण कई गुणा बढ़ जाते हैं जो साल भर तक हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव डालते हैं।

हमारे देश व धर्म में सारे संस्कार विधि और नियम

 हमारे जीवन और स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए है।

जिसे अब विज्ञान से भी जोड़ा जा रहा है,क्योंकि अब यह सत्यापित भी हो रहा है।