भारत समस्याओं से घिरी शिक्षा कब समाधान लेख भाग 3 सुनीता कुमारी बिहार पूर्णिया


 शिक्षित भारत में समस्याओं से घिरी शिक्षा को कब समाधान मिलेगा ?? (भाग-3)

लेखिका सुनीता कुमारी

पूर्णियाँ बिहार ।


हमे, हमारे जीवन में बहुत सारे वस्तुओ की अश्यकता होती है।  सुबह से शाम तक हम इतने सारे वस्तुओ का  उपयोग करते हैं कि हमें खुद भी याद नहीं रहता कि, हम एक दिन में कितने सारे वस्तुओं का प्रयोग कर

 रहे हैं?

  हम अपनी जरूरतों के हिसाब से जीवन जीते हैं, धन अर्जन करते हैं और अपने जीवन को खुशहाल बनाने का प्रयास करते हैं। 

इन जरूरत को पूरा करने के लिए लोगो का प्रयास ही रोजगार का साधन बनता है।इस क्रम में दो ही बाते होती है या तो हम खुद से वस्तुओ का उत्पादन कर विक्रय  करे या किसी के अधीन रहकर नौकरी

 करे ।

स्वरोजगार खुद से करने की प्रकिया है और नौकरी किसी के अधीन रहकर कार्य करने की प्रक्रिया है।

वर्तमान मे अधीनस्थ यानि नौकरी की प्रकिया को ही लोगो के द्वारा  महत्व दिया  जाता है।

मध्यवर्ग में एक ही सोच हर माता पिता की होती है की बच्चा शिक्षा ग्रहण करने के उपरांत कही न कही अच्छी नौकरी करे , धन अर्जन भी करे और ,माता पिता का नाम रौशन भी करे ।

शायद ही कोई माता पिता बच्चों को इसलिए पढ़ाते है की बच्चा अच्छी पढ़ाई कर स्वरोजगार करे।

पर यह भूल जाते है कि, बच्चा स्वरोजगार के द्वारा ज्यादा अच्छा कर सकता हैं ज्यादा धन अर्जन 

सकता है।

प्राचीन काल से  हमारे देश की अर्थव्यवस्था में जातिगत हुआ करता था जातिगत कौशल हुआ करती थी ,प्रत्येक जाति की कोई न कोई व्यवसाय हुआ करता था, साथ ही प्रत्येक जाति के लोग जातिगत व्यवसाय के साथ- साथ खेती और पशुपालन भी किया करते थे,जिससे अर्थव्यवस्था सुदृढ़ थी।

जैसे जैसे जाति में वाद जुड़ने लगा वैसे वैसै स्थिति बिगड़ती गई एवं आर्थिक स्थिति भी बिगड़ती गई। जातिगत कौशल समाप्त होने लगी ,आधी अधूरी शिक्षा प्राप्त कर बेरोज़गार लोगो की भीड़ बढ़ने लगी।ऐसे लोग न तो पुश्तैनी व्यवसाय करने में रूची ले सके ना ही कृषि या पशुपालन जैसी परम्परागत कार्य में शामिल हो सके।भारत की आधी अधूरी दिशाहीन शिक्षा ने 

बेरोज़गार की फौज खरी कर रखी है।

आज भी हमारे घरों के आसपास वैसे पढ़े लिखे ऐसे पढ़े लिखे छात्रों की अच्छी खासी संख्या है जिसने शिक्षा तो प्राप्त की है मगर,वे न तो उन्हे अच्छी नौकरी मिल रही है ,न वे अपना कोई स्वरोजगार कर पा रहे है कृषि और पशुपालन तो बहुत दूर की बात है।

अनिवार्य शिक्षा तो सरकार ने लागू की मगर अनिवार्य शिक्षा की मंजिल यानि रोजगार का भविष्य अंधकार मय ही रहा। माध्यमिक तक की शिक्षा हासिल करने के बाद नौकरी न मिलने के कारण निम्न वर्ग का विश्वास शिक्षा पर न रहा और उच्चवर्ग उच्च शिक्षा प्राप्त करने विदेश का दौरा करने लगे।

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था एक ऐसी ट्रेन की तरह है,

जिस पर लोग मंजिल पाने के लिए सवार तो हो जाते है,

शिक्षा ग्रहण के कठिन सफर पर निकल पड़ते है, पर जाना कहा  है?

कौन सी मंजिल रूपी स्टेशन पर पहुँचा है ?यह पता नही होता है। 

हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था से उच्च वर्ग एवं निम्न वर्ग का कोई लेना देना नहीं है ,उच्च वर्ग के लोग अपने बच्चों को उचित शिक्षा देने के लिए सीधा विदेश भेज देते हैं और वह शिक्षा अध्ययन कर भारत आकर अपने पुश्तैनी कारोबार को संभालते हैं या नया कारोबार शुरू कर अच्छा से अच्छा करते हैं। उन्हें भारत की अंधकारमयी कमजोर शिक्षा व्यवस्था से कोई लेना देना नहीं होता है । उनके पास इतना धन संपदा होता है कि, वह आराम से विदेशों में शिक्षा ग्रहण करते हैं।देश विदेश तक व्यापार फैलाते है।

बड़े-बड़े उद्योगपति बड़े-बड़े राजघरानाओं के नेताओं के बच्चे  विदेशों में जाकर शिक्षा ग्रहण करते हैं। भले वह राजनीति अच्छी करें या ना करें ?देश में शिक्षा का विकास करें या ना करें ?

देश का विकास करें या ना करें? परंतु विदेशों में अच्छी शिक्षा जरूर ग्रहण करते हैं ?

इसलिए किसी बड़े या छोटे नेता को जरूरत ही नहीं पड़ती कि भारत में  शिक्षा का विकास हो , जिससे भारत  मध्यम वर्ग के बच्चे अच्छी शिक्षा ग्रहण कर सके।

 अच्छी नौकरी कर सके,या व्यवसायकर सके।

उच्च वर्ग का काम विदेशों की उचित शिक्षा व्यवस्था से चल जाता है और निम्न वर्ग हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था के अंधकार में पचड़े में नही पड़ते है क्योंकि,

 उनके पास ऐसे संसाधन ही नहीं है कि बच्चों को पढ़ाएं और अच्छी रोजगार या नौकरी की उम्मीद करें?

 सरकार के द्वारा अनिवार्य शिक्षा से भी इनका भला नहीं होता क्योंकि इस शिक्षा में भी बच्चों का कोई भविष्य ही नहीं होता है । माध्यमिक स्तर की शिक्षा से किसी भी बच्चों को कोई रोजगार या नौकरी नहीं मिलती और उच्च प्राप्त करना नामुमकिन है इसलिए निम्नवर्गीय लोग शिक्षा के कमजोर व्यवस्था से निम्न रहते है।

निम्न वर्ग में बच्चे जैसे ही थोड़ा बड़े हो जाते हैं उन्हें रोजगार में लगा दिया जाता है ,उन्हें किसी होटल में काम करने भेज दिया जाता है, या फिर दर्जी का काम करने भेज दिया जाता है या फिर  छोटी-छोटी फैक्ट्री मैं काम सीखने भेज दिया जाता है या फिर कपड़ा दुकान फल दुकान सब्जी दुकान में सेल्समैन का परंपरागत काम करने भेज दिया जाता है ।जहां इन्हें किसी शैक्षणिक  प्रमाण पत्र की आवश्यकता  नहीं 

होती है ।

इस मामले में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग की सोच एक ही जैसी है "धन अर्जन करना ।"

उच्च वर्ग के लोग उच्च शिक्षा विदेशों से प्राप्त कर धन अर्जन करते हैं या शिक्षा नही भी प्राप्त करते है तो भी पुस्तैनी करोबार धन मिल ही जाता है

और निम्न वर्ग के लोग बिना शिक्षा के ही धन अर्जन में लग जाते हैं।

 सारी मजबूरी मध्यम वर्ग के लोगों के साथ है इनके पास ना तो इतना पैसा होता है कि यह कोई बड़ा रोजगार कर सकें ,

इनके सामने एक ही रास्ता होता है कि, अच्छी शिक्षा ग्रहण कर अच्छी नौकरी करें ।

इसलिए हमारे देश में देखा जा सकता है कि सरकारी सभी बड़े पोस्ट पर उच्च मध्य वर्ग या मध्य वर्ग के लोग ही आसीन होते  हैं ।

कोई भी उच्च वर्ग का व्यक्ति इन सरकारी नौकरी में समय बर्बाद नहीं करता क्योंकि इससे प्राप्त धन से इनका जीवन ही नहीं चलेगा और निम्न वर्ग के लोगों की पहुंच  पदों तक होती ही नहीं है ।

भारत में कौशल युक्त रोजगार परक एवं उचित शिक्षा शिक्षा ग्रहण की आवश्यकता ना तो उच्चवर्ग को है और ना ही निम्न वर्ग को है ।

इसलिए शिक्षा में सुधार करने की इच्छा भी उच्च वर्ग में

आसीन नेताओ को है ही नहीं ?

इस दिशा में हम आम जनता को ही जागरूक होना होगा।व्यवसायिक शिक्षा को अपनाना होगा ।ताकि देश के एक  एक भी युवा को शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात 

रोजगार के लिए भटकना न पड़े।

उच्च वर्ग के तमाम नेता गण एवं सरकार में शामिल सभी नेतागण भारत की शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा पर उदासीन अकर्मक बने हुए हैं और शिक्षा को निजीकरण की दिशा में आगे बढ़ा चुके हैं ऐसे तमाम नेताओं का आम जनता को बहिष्कार करना होगा।

वर्तमान में जो देश के छात्रो की परेशानी है ,शिक्षक  बहाली की जो गलत प्रकिया है ,पाठ्यक्रम का जो ढ़ाचा है सब में बदलाव की जरूरत है।

शिक्षा के परम्परागत ढ़ाचा का आधुनिकीकरणकर देश में लागू करना होगा ,इसके लिए आम जनता के साथ- साथ सरकार को भी विचार करना होगा ।

शिक्षा संस्थान को निजी हाथों सौपने की जगह सुधार की आवश्यकता है ।क्योकि,शिक्षण संस्थान के निजीकरण से शिक्षा का व्यवसायीकरण बढ़ जाएगा ।

अनिवार्य शिक्षा की अवधारणा मिट्टी में मिल जाएगी।

वस्तुओ की महंगाई की तरह शिक्षाप्राप्ति भी महंगाई के असुर के हाथ की कठपुतली बन जाएगी।