चुनाव आयोग उसके नियम जनता और नेता समझ से परे लेखक राजकुमार बरुआ भोपाल



चुनाव बनाम युद्ध

लेखक राजकुमार बरुआ भोपाल मध्यप्रदेश


   अभी हाल फिलहाल में पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं हर राज्य के चुनाव का अपना ही अलग महत्व है,लेकिन कुछ राज्यों के चुनाव, चुनाव ना होकर पूरे देश के लिए एक उदाहरण बन जाता है। आज का मतदाता क्या सोच कर अपने मत का प्रयोग करता है, यह समझना पहले भी कठिन था और आज भी कठिन है। जनता द्वारा दिए जानेवाले वोट के समीकरण को समझना नामुमकिन सा उलझा हुआ सवाल हो गया है। हर राज्य की अपनी क्षेत्रीय समस्याएं हैं, भूगोल है, व्यवहार है और मानसिकता है ।चुनाव का सीधा असर उस राज्य के विकास के साथ होता है, एवं देश के लिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, परंतु जैसा सुनते हैं देखते हैं ,उलझने बढ़ती जा रही है।

अब तो बहुत हद तक इस बात को आप महसूस भी कर सकते हैं कि, आज का मतदाता भी स्वार्थी हो गया है । उसका स्वार्थ क्या है? तो पहला स्वार्थ आर्थिक? फिर सामाजिक? ,क्षेत्रीय ?और उसके बाद कुछ बचता है तो विकास और अच्छा सुशासन चुनना?

चुनाव, अब चुनाव ना होकर एक बिना हथियारों का युद्ध है। हिंसा जातिवाद क्षेत्रवाद पैसा शराब और भी कुछ ऐसी बातें हैं यहां लिखना भी मैं सही नहीं समझता। चुनाव के कुछ नियम होते हैं नियम बनाने वाला चुनाव आयोग है, जो सिर्फ कागजों पर ही नियम बनाता है और कागजों पर ही नियम लागू करवाता है? चुनाव के मैदान में उन नियमों का क्या महत्व है यह जगजाहिर है।

महाभारत के युद्ध से पहले जब दोनों सेनाएं युद्ध के लिए तैयार बैठी थी तो भीष्म पितामह के कहने पर दोनों सेनाओं के प्रमुख लोग एक साथ बैठे और युद्ध (चुनाव) के लिए नियमों पर बात हुई ,जिसमें प्रमुखता से कुछ नियमों को दोनों ने अपनी सहमति से बनाया, और उस पर अमल करने का दोनों सेनाओं ने वादा किया। पर युद्ध कैसे हुआ किस ने कौन सा नियम माना किसने नहीं माना यह तो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुका है।उसका कितना भयंकर परिणाम हुआ यह भी सबके सामने है। इतिहास ही वर्तमान को सिखाता है और अपने में सुधार करने का मौका देता है,सीख लेना तो दूर की बात है,लोग उसी इतिहास को बार बार दोहराते है?

बात हो रही है वर्तमान में चुनावों की, आप सब अखबारों के माध्यम से टीवी चैनल के माध्यम से  चुनावओ के बारे में ज्यादा से ज्यादा जानकारियां रखते हैं। जब हम चुनाव में हिंसा देखते हैं, पैसों का दुरुपयोग शराब और हत्या तक होते हुए देखते हैं तो,यह बात समझ के परे हो जाती है कि, किस नियम और कौन से नियम के अंतर्गत यह चुनाव हो रहे हैं ?या कराए जा रहे हैं ?

2021 में पश्चिम बंगाल में चुनाव हुए था, और वहां के चुनावों ने तो हिंसा का विश्व कीर्तिमान बना दिया था। इतनी हिंसा चुनाव आयोग के ऊपर बहुत ही बड़ा प्रश्न लगाता है और उसकी कार्यप्रणाली को संदेह के घेरे में रखता है ?अभी किसकी सरकार बनेगी इन चुनावों में कितना पैसा करदाताओं का खर्च होता है  ?इसका भी चुनाव में बहुत बड़ा महत्व है? अब तो चुनाव भी सरकारी आयोजनों की तरह लगते हैं, छ: महीने साल भर में आते ही रहते हैं ?जनता भी इन चुनावों से ऊब चुकी है? इसका उदाहरण गिरता हुआ मतदान प्रतिशत है ?एक समय बाद प्रति व्यक्ति पर यह नियम लगाना ही पड़ेगा कि उसको वोट देना अनिवार्य है नहीं तो सरकारी स्तर पर उसकी कुछ सुविधाएं छीन ली जाएंगी या कुछ नियम ऐसे जरूरी बनाना पड़ेंगे जिससे लोगों का चुनाव के प्रति मतदान करने में ज्यादा रुचि दिखे ‌। पर इसके लिए यह भी जरूरी है एक ऐसा सिस्टम बनाया जाए, जो चुनाव  और सरकारों की समय सीमा निर्धारित करें। पांच साल तक सरकार चलते रहें या कुछ बदलाव करके चुनाव को कम से कम 5 साल में एक बार तो हो। अल्पमत और बहुमत के चक्कर में सरकारों का कार्यकाल पूरा नहीं हो पाता है,जिसका का खामियाजाना जनता और चुनाव पर होने वाले खर्चे पर पड़ता है।

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