जब सार्वजनिक मंच पर रो पड़ी पीटी उषा कारण बद इंतजामी 14 सालो मैं कैसे बदली उड़न परी आंखों देखे

 मई 2009 का वाकया है. भोपाल में 49वीं राष्ट्रीय ओपन एथलेटिक्स मीट हो रही थी. मीट में पी टी ऊषा भी पहुँची थीं. इस बार वे दौड़ने के लिए नहीं आई थीं.


उनके साथ उनसे ट्रेनिंग हासिल की हुई कुछ युवा लड़कियां थीं जिन्हें मीट के लिए चुना गया था.स्पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया ने ऊषा के रहने का जहाँ इंतजाम किया था वह बेहद घटिया और गंदी जगह थी. उड़न परी और देश का गौरव जैसे नामों से पुकारी जाने वाली इस विनम्र चैम्पियन खिलाड़ी के लिए ढंग के कमरे तक की व्यवस्था न करने सकने वाली देश की सर्वोच्च खेल संस्था की बहुत किरकिरी हुई थी जब ऐसे व्यवहार से आहत ऊषा ने प्रेस कांफ्रेंस कर देश को इस नाइन्तजामी के बारे में बताया. उस कांफ्रेंस मे पी टी ऊषा के आंसू निकल पड़े थे. 

पी टी ऊषा के आंसू देख कर सारे देश में क्षोभ फ़ैल गया था. तत्कालीन खेलमंत्री मनोहर सिंह गिल को सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी थी.

चौदह साल में कितना कुछ बदल गया है. 

स्कूली जीवन के दिनों से ही मैंने पी टी ऊषा को बहुत मोहब्बत और सम्मान की निगाह से देखा है. उसे “मेरे ग़रीब देश की बेटी” बताने वाले वीरेन डंगवाल ने उसकी आँखों की चमक में “भूख को पहचानने वाली विनम्रता” को सुरक्षित पाया था और उसे अपनी एक बेहद लोकप्रिय कविता की नायिका बनाया था.

मैंने जीवन भर उसे एक प्रतिबद्ध खिलाड़ी और बेहद अपना जाना-समझा है. आज हमारे गरीब देश की बेटियाँ अप्रैल की गर्मी में सड़क पर भूखी-प्यासी बैठीं अपने अधिकारों की मांग कर रही हैं. वे अपराधियों द्वारा अपना सम्मान लूटे जाने जैसे विषय को सार्वजनिक मंच कर कह सकने की हिम्मत दिखा रही हैं. पी टी ऊषा उन्हें अनुशासन का पाठ सिखा रही हैं.

समय बहुत बदल गया है. आज इस बेटी को अपने लिए किसी ढंग के होटल में साफ़-सुथरे कमरे के लिए प्रेस के सामने रोने की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी क्योंकि उसके एक दस्तखत से देश के सारे फाइव स्टार होटल बुक हो सकते हैं. 

मेरे बहुत सारे नायक-नायिकाएं सत्ता की गोद में बैठते ही भूसे के ढेर में बदलने में एक पल नहीं लगाते. हो सकता है उन्हें अपराधी नेताओं से भय लगता हो पर भय किस भले इंसान को नहीं लगता. मामला रीढ़ की हड्डी के होने या न होने पर फंसता है.

जब पी टी ऊषा भोपाल में रोई थी मैं उसके साथ रोया था. आज वह एक शातिर प्रशासक की भाषा बोल रही है, मुझे उसने बेतरह खीझ और गुस्से से भर दिया है.

 एक सबक में कभी नहीं भूलता – “सही बात पर प्यार, गलत बात पर लात!”

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