नव दलित लेखक संघ नवलेश काव्य गोष्ठी

 



नदलेस की स्वतंत्र काव्य पाठ गोष्ठी

दिल्ली। नव दलित लेखक संघ की स्वतंत्र काव्य पाठ गोष्ठी गूगल मीट पर संपन्न हुई। गोष्ठी में रत्नकुमार सांभरिया, भीमराव गणवीर, सईद परवेज़, डा. सीमा माथुर, रूबी, अभिषेक, बबिता कुमारी, रजनी बौद्ध, राजगोपाल सिंह, नीरज छीलवार आदि कवि और विचारक आमंत्रित रहे। गोष्ठी की अध्यक्षता डा. कुसुम वियोगी ने की और संचालन लोकेश कुमार ने किया। गोष्ठी में डा. अमित धर्मसिंह, डा. गीता कृष्णांगी, आर. एस. मीणा, ज्ञानेंद्र कुमार, बंशीधर नाहरवाल, अरुण पासवान, शकुंतला दीपांजलि, इंदु रवि, डा. सुमन धर्मवीर, प्रवेश कटारिया, जलेश्वरी गेंदले, समय सिंह जोल, अनिल कुमार गौतम, ममता अंबेडकर, आर. पी. सोनकर, मोहन लाल सोनल मनहंस, पुष्पा विवेक, एस. एन. प्रसाद, यजवीर सिंह विद्रोही, हुमा ख़ातून, पवन कुमार, डा. मुकेश कुमार मिरोठा, राम किशन, चितरंजन गोप लुकाटी, डा. विपुल कुमार भवालिया, हरीश पांडल आदि उपस्थित रहे जिनमें से अधिकतर ने काव्य पाठ भी किया।

 गोष्ठी का आरंभ डा. सुमन धर्मवीर की कविताओं से हुआ। उन्होंने जीना शुरू करें शीर्षक से कविता कुछ इस प्रकार पढ़ी जैसे "चल बहन/जीना शुरू करें/टूटे सपने/तोहमत लगे रिश्ते/ससुरालिये दुश्मन बने/छोड़ सब/समुंद्र किनारे सैर करें/चल बहन/जीना शुरू करें। इनके बाद रामस्वरूप मीणा, आर. पी. सोनकर, समय सिंह जोल, इंदु रवि और शकुंतला दीपांजलि ने अपनी अपनी कविताएं और गजलें आदि प्रस्तुत की। मोहन लाल सोनल मनहंस की कविता "इतने औछे उतर आये" की काव्य पंक्तियां कुछ इस प्रकार रही -"यूँ कैसे कोई/संविधान को/सहज ही जला डाले?/संविधान बनाने वाले तो/महामानव थे अनूठे बिरले।"  एस. एन. प्रसाद के मुक्तक और गजलें खूब पसंद की गई। उनकी एक ग़ज़ल के अशआर कुछ इस प्रकार रहे -"खराबे में हूं फिर कैसे आबाद कहूं/ऐसी जिंदगी को क्यों न बर्बाद कहूं/कफ़स से रिहा कर क़तर दिए पर/ऐसे परिंदे को कैसे आजाद कहूं/जाति धर्म देख कर होते हैं जहां फैसला/ऐसे फैसले को कैसे निर्विवाद कहूं।" इनके बाद पवन कुमार ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की। ममता अंबेडकर की कविता की काव्य पंक्तियां कुछ इस प्रकार रहीं -"जालिमों से लड़ती भीम की रमाबाई थी/मजलूमों को बढ़ कर आंचल में जो समाई थी/जाती धर्म  चक्की में पिस्ते/डूबते दल दल से बचाई थी ऐसी हमारी महान माता रमा बाई थी।" 

          डा. अमित धर्मसिंह ने फूटा कुंभ जल जलहि समाना और यदि ऐसा है! शीर्षक से दो कविताएं प्रस्तुत की। उनकी पहली कविता की काव्य पंक्ति कुछ इस प्रकार रहीं -"उनकी आँखों में पानी था लाज-शर्म का, रिश्तों की लिहाज का/अपनी हालत पर शर्मिंदगी का पानी/भरा था उनके रोम-रोम में/उनके दिल में छुपे/दुखों के पहाड़ों से/फूटते रहते थे झरने/ये झरने पहाड़ों की हदें पार करके/खुश्क आँखों के पठारों को तर करते हुए/आ समाते थे/उनकी मैली बाजुओं और झीने आँचल में।" इनके बाद पुष्पा विवेक ने रजनी तिलक की पूण्यतिथि पर उन्हें नमन करते हुए कविता पाठ किया। तलाश शीर्षक वाली कविता में उन्होंने पढ़ा -"रजनी दी तुम्हारी बहुत याद आती है/तुमसे ही मैंने लिखना सीखा/आज तुम्हीं पर मुझे लिखना पड़ रहा है/मैंने प्रत्येक कविता में तुम्हारे दिए ही शब्दों को पिरोया है।" इनके बाद बंशीधर नाहरवाल ने अपनी कविताएं प्रस्तुत की। तत्पश्चात चितरंजन गोप लुकाटी का गीत अंतिम पैरा शीर्षक से कुछ इस प्रकार रहा -"छोड़ो ये सब, हमें क्या!/चलो, अमृत महोत्सव मनाएं/विजयी विश्व तिरंगा फहराएं/राष्ट्रप्रेम का भाषण दें/देशप्रेम का तराना गाएं/है प्रीत जहां की रीत सदा/मैं गीत वहां का गाता हूं!" तत्पश्चात,  हुमा ख़ातून की नज़्म खूब पसंद की गई। सईद परवेज़ की कविताएं खूब सराही गईं। डा. कुसुम वियोगी की गीत प्रस्तुति ने भी सबको आकर्षित किया। यजवीर सिंह विद्रोही, ज्ञानेंद्र कुमार और डा. मुकेश कुमार मिरोठा ने सारगर्भित टिप्पणियों में नदलेस के कार्यों और गोष्ठियों की भूरि भूरि प्रसंशा की। अध्यक्षीय वक्तव्य में डा. कुसुम वियोगी ने कहा कि नदलेस की यह गोष्ठी भी पूर्व की तरह ही सफल गोष्ठी रही। एक से बढ़कर एक रचना की प्रस्तुति, इस तथ्य का प्रमाण है। सभी रचनाकार ऐसे ही रचते रहें और समाज को बेहतर बनाने में अपना अमूल्य रचनात्मक योगदान देते रहें। यही हमारा और नदलेस का प्रयास है। सभी उपस्थित कवियों और विचारकों का धन्यवाद ज्ञापन डा. गीता कृष्णांगी ने किया।


रिपोर्ट

डा. गीता कृष्णांगी

सदस्य, नदलेस।

02/04/2023

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