कर्मशील भारतीके नाटक क्रांति सूर्य ज्योतिराव फुले पर नंदलेश ने की परिचर्चा गोष्ठी
कर्मशील भारती के नाटक 'क्रांतिसूर्य ज्योतिराव फुले' पर नदलेस ने की परिचर्चा गोष्ठी

          नव दलित लेखक संघ, दिल्ली ने कर्मशील भारती द्वारा लिखित ज्योतिबा फुले के जीवन संघर्ष पर आधारित ऐतिहासिक नाटक 'क्रांतिसूर्य ज्योतिराव फुले' पर ऑनलाइन परिचर्चा गोष्ठी का आयोजन किया। नाटक पर परिचर्चा करने के लिए मुख्य वक्ताओं में पुष्पा विवेक, अनुपा एस. एस., डॉ. गीता कृष्णांगी, मदनलाल राज़, डॉ. रवि निर्मला सिंह एवं डॉ. अमित धर्मसिंह उपस्थित रहे। विशेष टिप्पणी के लिए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुशीला टाकभौरे और लेखकीय वक्तव्य के लिए नाटककार कर्मशील भारती उपस्थित रहे। गोष्ठी की अध्यक्षता नदलेस के वर्तमान उपाध्यक्ष बंशीधर नाहरवाल ने की एवं संचालन वर्तमान सहसचिव बृजपाल सहज ने किया। गोष्ठी में क्रमशः महेंद्र कामा, मामचंद सागर, श्रीलाल बौद्ध, डॉ. लालचंद जैदिया जैदि, राधेश्याम कांसोटिया, कृष्णा कपूर, डॉ. विपुल कुमार भवालिया, स्वस्तिका संघमित्र, फूलसिंह कुस्तवार, जोगेंद्र सिंह, जालिम प्रसाद, प्रमोद सिंह, सलीमा, पुष्पा विवेक, जयराम कुमार पासवान, पवन सागर, डॉ. सर्वेश मौर्य, ज्ञानेंद्र सिद्धार्थ, रामसूरत भारद्वाज, प्रदीप कुमार ठाकुर, डॉ. घनश्याम दास, अजीत सिंह, इंदु रवि, जलेश्वरी गेंदले, ममता अंबेडकर आदि साहित्य के मर्मज्ञ रचनाकर उपस्थित रहे।
          सर्वप्रथम सभी उपस्थित अतिथि वक्ताओं और साहित्यकारों का स्वागत उद्बोधन मामचंद सागर ने किया और नाटककार कर्मशील भारती का संक्षिप्त परिचय संचालक बृजपाल सहज ने प्रस्तुत किया। तत्पश्चात, वक्ताओं ने नाटक पर विचार प्रस्तुत किए। डॉ. अमित धर्मसिंह ने कहा कि "नाटक मंचन और अभिनयता को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसमें ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई के जीवन संघर्ष को प्रमुख घटनाओं और परिघटनाओं के आधार पर प्रस्तुत किया गया है।" केरल से जुड़ी अनुपा एस. एस. ने कहा कि "नाटक हमें फुले और सावित्री बाई से जुड़ी बहुत सी जानकारी उपलब्ध करवाता है। इसके छोटे-छोटे संवाद गैर हिंदी भाषी के लिए भी पढ़ने और समझने में आसान हैं।" डॉ. गीता कृष्णांगी ने कहा कि "ज्योतिबा फुले के बहाने नाटक में स्त्री चेतना और शिक्षा से जुड़ा संघर्ष उभरकर सामने आया है। कुछ उदाहरणों और तथ्यों के प्रस्तुतिकरण में हुई भूलचूक पर ध्यान न दे तो यह एक सफल नाटक है।" 
          मदनलाल राज़ ने कहा कि "हिंदी भाषा में संभवतः यह पहला ऐसासहज और सरल नाटक है जो हमें ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई के सम्पूर्ण जीवन से अवगत कराता है। इसे पढ़कर दोनों के संघर्ष को आसानी से समझा जा सकता है।" डॉ. रवि निर्मला सिंह ने कहा कि "नाटक में स्त्री-पुरुष की शिक्षा का महत्त्वपूर्ण उद्देश्य अंतर्निहित है लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि किस तरह की शिक्षा। नाटक के शीर्षक पर भी विचार करने की आवश्यकता है। बावजूद इसके, नाटक पढ़ने और समझने में अति सरल और महत्त्वपूर्ण है।" पुष्पा विवेक ने कहा कि "इस तरह के नाटक हमें पुरखों के संघर्ष और उनकी शिक्षाओं से अवगत करवाते हैं। इनसे प्रेरणा लेकर हम बेहतर समाज बनाने की ओर प्रयास कर सकते हैं।" 
          विशेष टिप्पणीकार डॉ. सुशीला टाकभौरे ने कहा कि "ऐतिहासिक नाटक में तथ्यों, घटनाओं और चित्रण में प्रमाणिकता और सत्यता का खास ख्याल रखना होता है। नाटक पर हुई परिचर्चा से ज्ञात होता है कि कर्मशील भारती ने नाटक में उक्त बातों का खास ख्याल रखा है।" लेखकीय वक्तव्य में कर्मशील भारती ने सभी वक्ताओं और नदलेस का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि "मैंने नाटक लिखते हुए अपनी तरफ से पूरी सावधानी बरती है कि ज्योतिबा फुले और सावित्री बाई फुले के जीवन से जुड़े यथार्थ और सामाजिक संघर्ष को सामने ला सकूं। नाटक बहुत अधिक बड़ा, उबाऊ और मंचन में क्लिष्ट न हो, इन बातों का भी ख्याल रखा गया है।" अध्यक्षता कर रहे बंशीधर नाहरवाल ने कहा कि "यह नाटक ज्योतिबा फुले की जीवनी है। इसका अपना ही ऐतिहासिक महत्त्व है। इसके माध्यम से साहित्य समाज ज्योतिबा फुले के जीवन संघर्ष और जीवन दर्शन से भलीभांति परिचित हो सकेगा। इस महत्त्वपूर्ण नाटक लेखन के लिए नाटककार कर्मशील भारती को नदलेस परिवार की ओर से हार्दिक बधाई।" सभी उपस्थित साहित्यकारों का धन्यवाद ज्ञापन डॉ. अमित धर्मसिंह ने किया।

जोगेंद्र सिंह
प्रचार सचिव, नदलेस
98106 62993
26/02/2024
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