लखनऊ। वैभव कृष्ण के वीडियो से शुरू हुआ बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है। अगर सरकार वैभव कृष्ण को वीडियो वायरल होने के तुरंत बाद निलंबित कर देती तो शायद इतनी फजीहत से बच जाती मगर एक हफ्ते तक निर्णय की स्थिति में न आकर पूरे देश में सरकार के साथ-साथ आईपीएस अफसरों की जो फजीहत हुई उसने साफ कर दिया कि नौकरशाहों पर काबू नहीं किया गया तो संदेश अच्छा नहीं जायेगा। चौबीस घंटे बीत जाने के बाद भी लखनऊ और नोएडा में न तो एसएसपी की तैनाती ही हो पा रही है और न ही कमिश्नरी सिस्टम पर कोई फैसला हो सका है। ऐसे अनिर्णय ही सरकार पर सवाल खड़ा करते है। कमिश्नरी सिस्टम पर विपक्ष के साथ-साथ नौकरशाही में भी तलवारें खिंचती दिखने लगी हैं। आईएएस लॉबी इसका विरोध कर रही है तो आईपीेएस इसके पक्ष में आ गये हैं।
वैभव का मामला इसलिये भी उदाहरण है कि सरकार के आला अफसरों के मामले में नीचे तक यह संदेश जा रहा है कि संवेदनशील मामलों में तत्काल फैसले नहीं हो पा रहे हैं। जब वैभव का अश्लील वीडियो जारी हुआ तो कोई भी देखकर कह सकता था कि यह फर्जी नहीं है। एक एसएसपी खुलेआम इस तरह की अय्याशी करे। संघ के प्रचारकों का नाम पैसा वसूली करने में घसीट ले और वह भी कुछ पत्रकारों के चैट के आधार पर, सर्विस रूल का उल्लंघन करे तब भी उसके ऊपर फैसला लेने में सरकार को इतने दिन लग जाएं तो कहीं न कहीं सवाल खड़े होते ही हैं। वैभव की हर जायज-नाजायज बातों पर उसको संरक्षण देने वाले प्रभावशाली लोगों ने ही व्यवस्था को चौपट कर दिया है।
किसी ने यह नहीं पूछा कि पत्रकार की जमानत न हो इसके लिये वैभव ने किसके कहने पर ऐसे निजी वकील को खड़ा किया जिसकी फीस लाखों रूपये है। एक महिला ने आरोप लगाया कि उसका उत्पीडऩ करने वाले उसके सास, ससुर और पति से करोड़ों रुपये लेकर उनको बचाने की कोशिश वैभव ने किसके इशारे पर की। हालांकि वैभव इससे इंकार करते हैं। ऐसे कई मामले सामने आये पर लखनऊ में बैठे कुछ लोग सीएम को यह समझाने में जुटे रहे कि वैभव ईमानदार हैं। इससे पहले बुलंदशहर में भी हाईवे पर रेप और हत्या के बाद वैभव पर आरोप था कि उन्होंने गलत लोगों को पकड़ा जिसके बाद लापरवाही के चलते उनको निलंबित किया गया। उधर कमिश्नरी सिस्टम लागू होने की खबर ने आईएएस लॉबी में बेचैनी पैदा कर दी है। आईएएस किसी भी कीमत पर यह सिस्टम लागू करने को तैयार नहीं हैं तो आईपीेएस को लगता है कि इससे सुनहरा मौका दूसरा नहीं हो सकता। जाहिर है वैभव कृष्ण कांड को यूपी की नौकरशाही के इतिहास में हमेशा याद रखा जायेगा।
वैभव की रिपोर्ट के बाद पांच आईपीएस को हटा दिया गया। मतलब सरकार ने माना कि पोस्टिंग में लाखों रूपये की डील हुई। सवाल यह है कि अगर यह बात सही है तो शासन और सरकार में ऐसा कौन है जो लाखों रूपये लेकर यह तैनाती करा रहा था। सवाल सिर्फ तैनाती का नहीं उस रिपोर्ट में संघ के करीबी एक शख्स का नाम है और सूचना विभाग से उसको करोड़ों के काम देने और डील करने का भी जिक्र है। अगर वैभव की रिपोर्ट को सही मानकर पांच आईपीएस अफसरों को हटाया गया तो इस करोड़ों केकाम किसके कहने पर दिये गये और इसमें कौन सी डील थी और उसके पैसे किसको दिये गये यह भी जांच का विषय होना चाहिये। सूचना विभाग खुद सीएम के पास है तो जाहिर है विपक्ष उन पर भी निशाना साधेगा।
यूपी के मौजूदा सिस्टम में डीएम और एसपी मिलकर अच्छा काम कर रहे हैं। पुलिस कमिश्नरी सिस्टम में पुलिस की शिकायत पुलिस से करनी होगी जबकि अभी लोग पुलिस से परेशान होने पर डीएम से शिकायत करके संतुष्ट हो जाते हैं। आनन-फानन में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू करना ठीक नहीं होगा।
आलोक रंजन, पूर्व मुख्य सचिव, यूपी
पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू होने से पुलिस की कार्यशैली में बहुत सुधार आयेगा और जनता के काम भी आसानी से हो जायेंगे। दस लाख से ज़्यादा की आबादी वाले हर जिले में पुलिस कमिश्नरी सिस्टम लागू करना चाहिए।
सुलखान सिंह
पूर्व डीजीपी, यूपी..