3 नवंबर बलिदान दिवस प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा के जन्मदिन पर विशेष महावीर संगल जी

3 नवम्बर/बलिदान-दिवस प्रथम परमवीर चक्र विजेता मेजर सोमनाथ शर्मा आज कश्मीर का जो हिस्सा भारत के पास है, उसका श्रेय जिन वीरों को है, उनमें से मेजर सोमनाथ शर्मा का नाम अग्रणी है। 31 जनवरी, 1922 को ग्राम डाढ (जिला धर्मशाला, हिमाचल प्रदेश) में मेजर जनरल अमरनाथ शर्मा के घर में सोमनाथ का जन्म हुआ। इनके गाँव से कुछ दूरी पर ही प्रसिद्ध तीर्थस्थल चामुण्डा नन्दिकेश्वर धाम है। सैनिक परिवार में जन्म लेने के कारण सोमनाथ शर्मा वीरता और बलिदान की कहानियाँ सुनकर बड़े हुए थे। देशप्रेम की भावना उनके खून की बूँद-बूँद में समायी थी। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा नैनीताल में हुई थी। इसके बाद इन्होंने प्रिन्स अ१फ वेल्स र१यल इण्डियन मिलट्री कॉलेज, देहरादून से सैन्य प्रशिक्षण लिया। 22 फरवरी 1942 को इन्हें कुमाऊँ रेजिमेण्ट की चौथी बटालियन में सेकण्ड लेफ्टिनेण्ट के पद पर नियुक्ति मिली। इसी साल इन्हें डिप्टी असिस्टेण्ट क्वार्टर मास्टर जनरल बनाकर बर्मा के मोर्चे पर भेजा गया। वहाँ इन्होंने बड़े साहस और कुशलता से अपनी टुकड़ी का नेतृत्व किया। 15 अगस्त, 1947 को भारत के स्वतन्त्र होते ही देश का दुखद विभाजन भी हो गया। जम्मू कश्मीर रियासत के राजा हरिसिंह असमंजस में थे। वे अपने राज्य को स्वतन्त्र रखना चाहते थे। दो महीने इसी कशमकश में बीत गये। इसका लाभ उठाकर पाकिस्तानी सैनिक कबाइलियों के वेश में कश्मीर हड़पने के लिए टूट पड़े। वहाँ सक्रिय शेख अब्दुल्ला कश्मीर को अपनी जागीर बनाकर रखना चाहता था। रियासत के भारत में कानूनी विलय के बिना भारतीय शासन कुछ नहीं कर सकता था। जब राजा हरिसिंह ने जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान के प॰जे में जाते देखा, तब उन्होंने भारत के साथ विलय पत्र पर हस्ताक्षर किये। इसके साथ ही भारत सरकार के आदेश पर सेना सक्रिय हो गयी। मेजर सोमनाथ शर्मा की कम्पनी को श्रीनगर के पास बड़गाम हवाई अड्डे की सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गयी। वे केवल 100 सैनिकों की अपनी टुकड़ी के साथ वहाँ डट गये। दूसरी ओर सात सौ से भी अधिक पाकिस्तानी सैनिक जमा थे। उनके पास शस्त्रास्त्र भी अधिक थे; पर साहस की धनी मेजर सोमनाथ शर्मा ने हिम्मत नहीं हारी। उनका आत्मविश्वास अटूट था। उन्होंने अपने ब्रिगेड मुख्यालय पर समाचार भेजा कि जब तक मेरे शरीर में एक भी बूँद खून और मेरे पास एक भी जवान शेष है, तब तक मैं लड़ता रहूँगा। दोनों ओर से लगातार गोलाबारी हो रही थी। कम सैनिकों और गोला बारूद के बाद भी मेजर की टुकड़ी हमलावरों पर भारी पड़ रही थी। 3 नवम्बर, 1947 को शत्रुओं का सामना करते हुए एक हथगोला मेजर सोमनाथ के समीप आ गिरा। उनका सारा शरीर छलनी हो गया। खून के फव्वारे छूटने लगे। इस पर भी मेजर ने अपने सैनिकों को सन्देश दिया - इस समय मेरी चिन्ता मत करो। हवाई अड्डे की रक्षा करो। दुश्मनों के कदम आगे नहीं बढ़ने चाहिए....। यह सन्देश देतेे हुए मेजर सोमनाथ शर्मा ने प्राण त्याग दिये। उनके बलिदान से सैनिकों का खून खौल गया। उन्होंने तेजी से हमला बोलकर शत्रुओं को मार भगाया। यदि वह हवाई अड्डा हाथ से चला जाता, तो पूरा कश्मीर आज पाकिस्तान के कब्जे में होता। मेजर सोमनाथ शर्मा को मरणोपरान्त ‘परमवीर चक्र’ से सम्मानित किया गया। शौर्य और वीरता के इस अलंकरण के वे स्वतन्त्र भारत में प्रथम विजेता हैं। सेवानिवृत्त सेनाध्यक्ष जनरल विश्वनाथ शर्मा इनके छोटे भाई हैं। .......................................... 3 नवम्बर/जन्म-दिवस अन्तःप्रेरणा से बने प्रचारक नरमोहन दोसी किसी का जन्म और देहांत एक ही दिन हो; ऐसे संयोग कम ही होते हैं; पर मध्य प्रदेश के क्षेत्र प्रचारक श्री नरमोहन दोसी के साथ ऐसा ही हुआ। नरमोहन जी का जन्म तीन नवम्बर, 1947 को बांसवाड़ा (राजस्थान) में श्री देवीलाल दोसी के घर में हुआ था। उनका संघ जीवन भरपूर युवावस्था में प्रारम्भ हुआ। 1964 में उदयपुर के महाविद्यालय में पढ़ते समय वे छात्रावास में रहते थे। उनके कक्ष में रहने वाला दूसरा छात्र प्रह्लाद मेड़ात संघ का स्वयंसेवक था तथा नित्य शाखा जाता था। उसके आग्रह पर वे भी शाखा और कार्यालय जाने लगे और फिर धीरे-धीरे उनका जीवन संघमय होता चला गया। 1968 में उन्होंने संघ का प्रथम वर्ष का शिक्षण लिया। उदयपुर के तत्कालीन विभाग प्रचारक श्री लक्ष्मण सिंह शेखावत के समर्पित जीवन और प्रेमपूर्ण व्यवहार से प्रभावित होकर वे प्रचारक बन गये। इसके बाद 1969 और 70 में उन्होंने द्वितीय और तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त किया। नरमोहन जी की मान्यता थी कि किसी कार्यकर्ता को प्रचारक बनाने का माध्यम यद्यपि कोई व्यक्ति ही होता है; पर वास्तव में उसकी अन्तःप्रेरणा ही उसे इस पथ पर आगे ले जाती है। उनके प्रचारक बनने के कुछ समय बाद एक समय उदयपुर में उनके जिला प्रचारक रहे श्री कौशल किशोर जी अपनी पारिवारिक कठिनाइयों के चलते घर वापस चले गये। जाते समय उन्होंने नरमोहन जी से कहा कि मैंने तुम्हें अपनी शिक्षा पूर्ण कर प्रचारक बनने का आग्रह किया था; पर अब मैं ही प्रचारक जीवन को छोड़ रहा हूं। ऐसे में तुम्हारे मन पर कोई विपरीत प्रभाव तो नहीं पड़ेगा ? नरमोहन जी ने कहा कि देश की आवश्यकता को देखते हुए मैं प्रचारक बना हूं। यद्यपि जिला प्रचारक होने के नाते आप निमित्त बने हैं; पर मेरी प्रेरक शक्ति तो मेरी अंतरात्मा है। इसलिए आपके प्रचारक रहने या न रहने से मेरे निश्चय पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। नरमोहन जी पहले उदयपुर तहसील प्रचारक रहे। इसके दो वर्ष बाद उन्हें वहां पर ही जिला प्रचारक का दायित्व दिया गया। 1970 से 1981 तक वे उदयपुर, राजसमुन्द और फिर जयपुर में जिला प्रचारक रहे। 1981 में पाली विभाग तथा 1989 में जोधपुर संभाग का काम उन्हें दिया गया। आगे चलकर जब राजस्थान को तीन प्रान्तों में बांटा गया, तो उन्हें जोधपुर प्रान्त प्रचारक की जिम्मेदारी दी गयी। 1997 में उन्हें मध्य प्रदेश का क्षेत्र प्रचारक बनाया गया। इस प्रकार उनका केन्द्र भोपाल तथा कार्यक्षेत्र राजस्थान से मध्य प्रदेश हो गया। प्रवास की अधिकता तथा भोजन-विश्राम की अनियमितता से प्रायः वरिष्ठ प्रचारकों को अनेक रोग घेर लेते हैं। नरमोहन जी भी भीषण मधुमेह के शिकार हो गये। इसके बाद भी वे दवा एवं आवश्यक सावधानी के साथ प्रवास करते रहे। संघ की प्रतिवर्ष तीन बार केन्द्रीय बैठकें होती हैं। इनमें देश में चल रहे संघ कार्य की जानकारी लेकर आगामी योजनाएं बनाई जाती हैं। इसी क्रम में वर्ष 2004 की केन्द्रीय कार्यकारी मंडल की बैठक नवम्बर मास में हरिद्वार में हुई। वहां तीन नवम्बर को नरमोहन जी को अचानक भीषण हृदयाघात हुआ और तत्काल ही उनका शरीरान्त हो गया। मां गंगा के तट पर सब वरिष्ठ कार्यकर्ताओं की उपस्थिति में उनका अंतिम संस्कार किया गया। जो लोग जीवन भर मां गंगा के दर्शन न कर सकें, उनकी भी इच्छा रहती है कि उनकी अस्थियां गंगा में प्रवाहित की जाएं। यह सुखद आश्चर्य है कि जब नरमोहन जी का देहांत हुआ, तब वे भाग्यवश मां गंगा की गोद में ही थे। एक अन्य आश्चर्यजनक संयोग यह भी है कि उनके पिताजी के जन्म और देहांत का दिनांक भी एक ही था। (संदर्भ : मध्यभारत की संघगाथा) ..................................................इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196


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