क्रांतिवीर अशोक नंदी के जन्मदिन पर विशेष महावीर संगल


 26 नवम्बर/बलिदान-दिवस


क्रांतिवीर अशोक नन्दी




न्याय को प्रायः अन्धा कहा जाता है, क्योंकि वह निर्णय करते समय केवल कानून को देखता है, व्यक्ति को नहीं; पर अंग्रेजी राज में कभी-कभी न्यायाधीश भी अन्धों की तरह व्यवहार करते थे। क्रांतिवीर अशोक नंदी को इसका दुष्परिणाम अपने प्राण देकर चुकाना पड़ा।


अशोक नंदी एक युवा क्रांतिकारी था। देखने में वह दुबला पतला तथा अत्यन्त सुंदर था; पर उसके दिल में देश को स्वाधीन कराने की आग जल रही थी। इसीलिए वह क्रांतिकारी दल में शामिल होकर बम बनाने लगा। एक बार पुलिस ने बम फैक्ट्री पर छापा मारा, तो वह भी पकड़ा गया। इसलिए उसे जेल में बंद कर ‘अलीपुर बम कांड’ के अन्तर्गत मुकदमा चलाया गया।


पुलिस ने उस पर दो मुकदमे लाद दिये। एक मुकदमा विस्फोटक पदार्थों से संबंधित था, तो दूसरा ब्रिटिश शासन के विरुद्ध युद्ध का। क्रांतिकारी लोग सावधानी रखते हुए बम की सारी सामग्री एक ही जगह नहीं बनाते थे। इससे विस्फोट होने के साथ ही अन्य कई तरह के खतरे भी थे। जहां से अशोक नंदी पकड़ा गया, वहां बम का केवल एक भाग ही बनता था। इस आधार पर वकीलों ने बहस कर उसे निर्दोष सिद्ध करा दिया। 


पर दूसरे मुकदमे में उसे सात वर्ष के लिए अंदमान जेल का दंड दिया गया। अशोक के परिजनों ने इसके विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील की। इसलिए उसे अंदमान भेजना तो स्थगित हो गया; पर जेल में उसे अमानवीय परिस्थितियों में रखा गया। इससे वह जोड़ों की टी.बी. से ग्रस्त हो गया।


उच्च न्यायालय में कोलकाता के प्रसिद्ध देशभक्त वकील श्री चितरंजन दास ने अशोक नंदी का मुकदमा लड़ा। चितरंजन दास जी की योग्यता की देश भर में धाक थी। उन्होंने न्यायाधीश से अशोक नंदी की जमानत का आग्रह करते हुए कहा कि एक मुकदमे में वह निर्दोष सिद्ध हो चुका है। दूसरे पर उच्च न्यायालय में विचार हो रहा है। फिर उसका स्वास्थ्य भी बहुत खराब है। अतः  उसे जमानत पर जेल से छोड़ देना चाहिए। 


पर न्यायाधीश ने इन तर्कों को नहीं सुना। उसने अपील ठुकराते हुए कहा कि अभियुक्त को दुमंजिले अस्पताल के हवादार कमरे में रखा गया है। उसका इलाज भी किया जा रहा है। इतनी अच्छी सुविधाएं उसे अपने घर में भी नहीं मिलेंगी। अतः उसे जमानत पर नहीं छोड़ा जा सकता। 


अब श्री चितरंजन दास ने अशोक नंदी के पिताजी को सुझाव दिया कि वे बंगाल के गवर्नर महोदय के पास जाकर अपनी बात कहें। यदि वे चाहें, तो अशोक की जमानत हो सकती है। मरता क्या न करता; अशोक के पिताजी ने गवर्नर महोदय के पास जाकर प्रार्थना की। उनका दिल न्यायाधीश जैसा कठोर नहीं था। उन्होंने प्रार्थना स्वीकार कर ली। 


अब न्यायालय के सामने भी उसे छोड़ने की मजबूरी थी। 26 नवम्बर, 1909 को न्यायाधीश ने अशोक नंदी को निर्दोष घोषित कर रिहाई के कागजों पर हस्ताक्षर कर दिये; पर मुक्ति के कागज लेकर जब पुलिस और अशोक के परिजन जेल पहुंचे, तो उन्हें पता लगा कि वह तो इस जीवन से ही मुक्त होकर वहां जा चुका है, जहां से कोई लौटकर नहीं आता। 


इस प्रकार न्यायालय की कठोर प्रक्रिया ने एक 19 वर्षीय, तपेदिक के रोगी, युवा क्रांतिवीर को जेल के भीतर ही प्राण देने को बाध्य कर दिया। 


(संदर्भ : क्रांतिकारी कोश)

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26 नवम्बर/जन्म-दिवस    


महान गोभक्त लाला हरदेवसहाय


गोरक्षा आन्दोलन के सेनापति लाला हरदेवसहाय जी का जन्म 26 नवम्बर, 1892 को ग्राम सातरोड़ (जिला हिसार, हरियाणा) में एक बड़े साहूकार लाला मुसद्दीलाल के घर हुआ था। संस्कृत प्रेमी होने के कारण उन्होंने बचपन में ही वेद, उपनिषद, पुराण आदि ग्रन्थ पढ़ डाले थे। उन्होंने स्वदेशी व्रत धारण किया था। अतः आजीवन हाथ से बुने सूती वस्त्र ही पहने।


लाला जी पर श्री मदनमोहन मालवीय, लोकमान्य तिलक तथा स्वामी श्रद्धानंद का विशेष प्रभाव पड़ा। वे अपनी मातृभाषा में शिक्षा के पक्षधर थे। अतः उन्होंने ‘विद्या प्रचारिणी सभा’ की स्थापना कर 64 गांवों में विद्यालय खुलवाए तथा हिन्दी व संस्कृत का प्रचार-प्रसार किया। 1921 में तथा फिर 1942 के ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ में वे सत्याग्रह कर जेल गये। 


लाला जी के मन में निर्धनों के प्रति बहुत करुणा थी। उनके पूर्वजों ने स्थानीय किसानों को लाखों रुपया कर्ज दिया था। हजारों एकड़ भूमि उनके पास बंधक थी। लाला जी वह सारा कर्ज माफ कर उन बहियों को ही नष्ट कर दिया, जिससे भविष्य में उनका कोई वंशज भी इसकी दावेदारी न कर सके। भाखड़ा नहर निर्माण के लिए हुए आंदोलन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही।


1939 में हिसार के भीषण अकाल के समय मनुष्यों को ही खाने के लाले पड़े थे, तो ऐसे में गोवंश की सुध कौन लेता ? लोग अपने पशुओं को खुला छोड़कर अपनी प्राणरक्षा के लिए पलायन कर गये। ऐसे में लाला जी ने दूरस्थ क्षेत्रों में जाकर चारा एकत्र किया और लाखों गोवंश की प्राणरक्षा की। उन्हें अकाल से पीड़ित ग्रामवासियों की भी चिन्ता थी। उन्होंने महिलाओं के लिए सूत कताई केन्द्र स्थापित कर उनकी आय का स्थायी प्रबंध किया। 


सभी गोभक्तों का विश्वास था कि देश स्वाधीन होते ही संपूर्ण गोवंश की हत्या पर प्रतिबंध लग जाएगा; पर गांधी जी और नेहरु इसके विरुद्ध थे। नेहरु ने तो नये बूचड़खाने खुलवाकर गोमांस का निर्यात प्रारम्भ कर दिया। लाला जी ने नेहरु को बहुत समझाया; पर वे अपनी हठ पर अड़े रहे। लाला जी का विश्वास था कि वनस्पति घी के प्रचलन से शुद्ध घी, दूध और अंततः गोवंश की हानि होगी। अतः उन्होंने इसका भी प्रबल विरोध किया।


लाला जी ने ‘भारत सेवक समाज’ तथा सरकारी संस्थानों के माध्यम से भी गोसेवा का प्रयास किया। 1954 में उनका सम्पर्क सन्त प्रभुदत्त ब्रह्मचारी तथा करपात्री जी महाराज से हुआ। ब्रह्मचारी जी के साथ मिलकर उन्होंने कत्ल के लिए कोलकाता भेजी जा रही गायों को बचाया।

इन दोनों के साथ मिलकर लालाजी ने गोरक्षा के लिए नये सिरे से प्रयास प्रारम्भ किये। अब उन्होंने जनजागरण तथा आन्दोलन का मार्ग अपनाया। इस हेतु फरवरी 1955 में प्रयाग कुम्भ में ‘गोहत्या निरोध समिति’ बनाई गयी।


लाला जी ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक देश में पूरी तरह गोहत्या बन्द नहीं हो जायेगी, तब तक मैं चारपाई पर नहीं सोऊंगा तथा पगड़ी नहीं पहनूंगा। उन्होंने आजीवन इस प्रतिज्ञा को निभाया। उन्होंने गाय की उपयोगिता बताने वाली दर्जनों पुस्तकंे लिखीं। उनकी ‘गाय ही क्यों’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की भूमिका तत्कालीन राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद ने लिखी थी। लाला जी के अथक प्रयासों से अनेक राज्यों में गोहत्या-बन्दी कानून बने। 


30 सितम्बर, 1962 को गोसेवा हेतु संघर्ष करने वाले इस महान गोभक्त  सेनानी का निधन हो गया। उनका प्रिय वाक्य ‘गाय मरी तो बचता कौन, गाय बची तो मरता कौन’ आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है।


(संदर्भ : लाला हरदेव सहाय, जीवनी/लेखक एम.एम.जुनेजा)

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26 नवम्बर/जन्म-दिवस    


दुग्ध क्रांति के जनक वर्गीज कुरियन


कहते हैं कि किसी समय भारत में दूध-दही की नदियां बहती थीं; पर फिर ऐसा समय भी आया कि बच्चों तक को शुद्ध दूध मिलना कठिन हो गया। इस समस्या को चुनौती के रूप में स्वीकार करने वाले श्री वर्गीज कुरियन का जन्म 26 नवम्बर, 1921 को कोझीकोड (केरल) में हुआ था। मैकेनिकल इंजीनियर की पढ़ाई कर वे सेना में भर्ती होना चाहते थे; पर कुछ समय पूर्व ही उनके पिता की मृत्यु हुई थी। अतः मां ने उन्हें अनुमति नहीं दी और चाचा के पास जमशेदपुर भेजकर टाटा उद्योग में काम दिला दिया।


1944 में सरकारी छात्रवृत्ति पाकर उन्होंने अमरीका के मिशिगन वि.वि. से मैकेनिकल तथा डेयरी विज्ञान की पढ़ाई की। इससे पूर्व उन्होंने राष्ट्रीय डेरी शोध संस्थान, बंगलौर में भी प्रशिक्षण लिया था। पढ़ाई पूरी होते ही अमरीकी बहुराष्ट्रीय कम्पनी यूनियन कार्बाइड ने उन्हें बहुत अच्छे वेतन पर कोलकाता में नौकरी का प्रस्ताव दिया; पर सरकारी अनुबन्ध के कारण उन्हें 1949 में गुजरात के एक छोटे से कस्बे आनंद के डेरी संस्थान में नौकरी स्वीकार करनी पड़ी। 


श्री कुरियन खाली समय में वहां कार्यरत ‘खेड़ा जिला दुग्ध उत्पादक संघ’ की कार्यशाला में चले जाते थे। यह घाटे में चल रही एक सहकारी समिति थी, जिसकी देखरेख श्री त्रिभुवन दास पटेल करते थे। श्री कुरियन के सुझावों से इसकी स्थिति सुधरने लगी। गांव वालों का विश्वास भी उनके प्रति बढ़ता गया। अतः अनुबंध पूरा होते ही उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़कर 800 रु. मासिक पर इस समिति में प्रबंधक का पद स्वीकार कर लिया।


श्री कुरियन के प्रयासों से समिति के चुनाव समय पर होने लगे। काम में पारदर्शिता आने से गांव के लोग स्वयं ही इससे जुड़ने लगे। उन्होंने अपनी समिति से लोगों को अच्छी नस्ल की गाय व भैंसों के लिए कर्ज दिलवाया तथा दूध की उत्पादकता के साथ ही उसकी शुद्धता पर भी जोर दिया। कुछ ही समय में उनकी सफलता की चर्चा पूरे देश में होने लगी। 


1965 में प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री ने उन्हें पूरे देश में इसी तरह का काम प्रारम्भ करने को कहा। श्री कुरियन ने दो शर्तें रखी। पहली तो यह कि उनका मुख्यालय आनंद में ही होगा और दूसरी यह कि सरकारी अधिकारी उनके काम में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। शास्त्री जी ने इसे मान लिया। इस प्रकार आनंद और अमूल के उदाहरण के आधार पर पूरे देश में काम प्रारम्भ हो गया। 


उनकी कार्यशैली के परिणाम शीघ्र ही दिखाई देने लगे। उन दिनों गर्मियों में दूध की कमी हो जाती थी। अतः महंगे दामों पर विदेश से दूध मंगाना पड़ता था; पर आज वर्ष भर पर्याप्त दूध उपलब्ध रहता है। उन्होंने विश्व में पहली बार भैंस के दूध से पाउडर बनाने की विधि भी विकसित की। 


वैश्विक ख्याति के व्यक्ति होने के बाद भी वे टाई या सूट जैसे आडम्बर से दूर रहते थे। उनके प्रयासों से गुजरात और फिर भारत के लाखों दूध उत्पादकों की आर्थिक तथा सामाजिक स्थिति में सुधार हुआ। उनकी उपलब्धियों को देखकर उन्हें राष्ट्रीय तथा अन्तरराष्ट्रीय स्तर के अनेक प्रतिष्ठित सम्मान मिले। 


भारत को विश्व में सर्वाधिक दूध उत्पादक देश बनाने वाले दुग्ध क्रांति के पुरोधा श्री कुरियन का 90 वर्ष की आयु में नौ सितम्बर, 2012 को अपनी कर्मभूमि आनंद में ही देहांत हुआ। वे जन्म से ईसाई होते हुए भी अनेक हिन्दू मान्यताओं के समर्थक थे। अतः उनकी इच्छानुसार आनंद के कैलाश धाम में सर्वधर्म प्रार्थना सभा के बीच उनका दाह संस्कार किया गया।


(संदर्भ : 10/11.9.2012 के समाचार पत्र आदि)

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इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196

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