नवंबर मेरु भाऊ मुंजे संघ प्रचारक के जन्मदिन पर विशेष महावीर संगल जी

18 नवम्बर/जन्म-दिवस तेजस्वी कार्यकर्ता मोरुभाऊ मुंजे प्रचारक और फिर गृहस्थ जीवन बिताते हुए भी संघ कार्य को ही अपने जीवन की प्राथमिकता मानने वाले कार्यकर्ताओं की विशाल मालिका के बल पर ही आज रा.स्व.संघ का काम दुनिया भर में प्रभावी हुआ है। श्री मोरेश्वर राघव (मोरुभाऊ) मुंजे ऐसे ही एक कार्यकर्ता थे। उनका जन्म महाराष्ट्र में वर्धा जिले के पवनार ग्राम में 18 नवम्बर, 1916 को हुआ था। 1927 में 11 वर्ष की अवस्था में मोरुभाऊ अच्छी शिक्षा पाने के लिए नागपुर आ गये। एक दिन शाम को मोरुभाऊ ने मोहिते के बाड़े के पास स्थित खंडहर में कुछ लड़कों को खेलते देखा। अगले दिन वे फिर वहां गये, तो 38 वर्षीय एक तेजस्वी पुरुष ने उन्हें भी खेल में शामिल होने के लिए कहा। वे संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार थे। इस प्रकार मोरुभाऊ संघ से जुड़े, तो फिर संघ ही उनके जीवन के रग-रग में समा गया। क्रमशः वे डा. हेडगेवार के अतिप्रिय स्वयंसेवकों में से एक बन गये। डा. हेडगेवार की इच्छा थी कि संघ का काम यथाशीघ्र पूरे देश में फैल जाए। अतः उन्होंने कुछ युवा स्वयंसेवकांे को नागपुर से बाहर जाकर पढ़ने के लिए प्रेरित किया। 1932 में ऐसे चार कार्यकर्ता बाहर गये। इन चारों को डा. हेडगेवार ने स्वयं विदा किया। मोरुभाऊ को इससे बहुत प्रेरणा मिली। उन दिनों विभाजन की आशंकाएं हवा में तैर रही थीं। पंजाब का माहौल लगातार बिगड़ रहा था। अतः डा. जी कुछ साहसी कार्यकर्ताओं को वहां भेजना चाहते थे। 1937 में उन्होंने दिगम्बर विश्वनाथ (राजभाऊ) पातुरकर को लाहौर, कृष्ण धुंडीराज (के.डी.) जोशी को स्यालकोट तथा मोरुभाऊ को बप्पा रावल द्वारा स्थापित रावलपिंडी भेज दिया। मोरुभाऊ ने इसी वर्ष नागपुर के सिटी कॉलिज से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उनके परिश्रम से वहां श्री गुरुपूर्णिमा उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाये गये। डा. जी ने पत्र लिखकर तीनों को बधाई दी। 1937 से 1941 तक मोरुभाऊ रावलपिंडी के विभाग प्रचारक रहे। इस दौरान उन्होंने झेलम, पेशावर तथा गुजरांवाला जैसे बड़े नगरों तथा कई गांवों में शाखाएं शुरू कीं। वहां मुस्लिम जनसंख्या 60 से 90 प्रतिशत तक थी। अतः शाखा लगाना बहुत खतरे से भरा काम था। मोरुभाऊ ने युवकों को प्रभावित करने के लिए एक बार झेलम के बर्फीले पानी में पुल से छलांग लगायी और तैरकर किनारे आ गये। मुसलमानों ने दो बार उनकी हत्या का भी प्रयास किया। प्रख्यात विद्वान और क्रांतिवीर भाई परमानंद से भी मोरुभाऊ का गहरा संबंध रहा। 1941 में मोरुभाऊ मध्य प्रदेश में रायपुर तथा 1943 से 45 तक जबलपुर में विभाग प्रचारक रहे। 1946 में गृहस्थ होकर वे जबलपुर के ‘महाराष्ट्र विद्यालय’ में पढ़ाने लगे। गांधी हत्या के बाद वे गिरफ्तार कर लिये गये। सात महीने बाद छूटने पर उन्होंने 52 स्वयंसेवकों के साथ फिर सत्याग्रह किया। इस बीच उनकी नौकरी छूट गयी। अतः एक दवा कम्पनी में काम कर उन्होंने किसी तरह घर चलाया। इसके बावजूद वे संघ में तथा उनकी पत्नी जनसंघ में सक्रिय रहीं। श्रीमती कुमुदिनी मुंजे ने 1965 के कच्छ सत्याग्रह में जबलपुर के महिला जत्थे का नेतृत्व किया। 1947 में पंजाब से जबलपुर आये लोगों को वे लम्बे समय तक प्रतिदिन एक टीन आटा तथा एक टोकरी आलू देते रहे। 1982 से 89 तक वे प्रांत बौद्धिक प्रमुख तथा फिर संभाग प्रचारक रहे। इसके बाद उन पर विश्व हिन्दू परिषद की जिम्मेदारी रही। अयोध्या आंदोलन के समय उन्होंने कारसेवा में भाग लिया तथा चार महीने मणिराम छावनी में रहकर व्यवस्था संभाली। जबलपुर में उन्होंने ‘डा.हेडगेवार स्मृति मंडल’ की स्थापना की, जिससे कई सेवा कार्य किये जा रहे हैं। वर्ष 2000 में श्री हो.वे.शेषाद्रि के आग्रह पर उन्होंने बंगलौर में डा. हेडगेवार तथा संघ के प्रारम्भिक इतिहास पर कई व्याख्यान दिये। आठ दिसम्बर, 2007 को हृदयाघात से ऐसी तेजस्वी कार्यकर्ता का निधन हुआ। (संदर्भ: पांचजन्य 26.3.2017) ------------------------------- 18 नवम्बर/जन्म-दिवस परोपकार की प्रतिमूर्ति स्वामी प्रेमानन्द भारत में संन्यास की एक विशेष परम्परा है। हिन्दू धर्म में ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और फिर संन्यास को आश्रम व्यवस्था कहा गया है; पर कई लोग पूर्व जन्म के संस्कार या वर्तमान जन्म में अध्यात्म और समाज सेवा के प्रति प्रेम होने के कारण ब्रह्मचर्य से सीधे संन्यास आश्रम में प्रविष्ट हो जाते हैं। आद्य शंकराचार्य ने समाज में हो रहे विघटन एवं देश-धर्म पर हो रहे आक्रमण से रक्षा हेतु दशनामी संन्यासियों की परम्परा प्रारम्भ की; पर इन दशनाम संन्यासियों से अलग भी अनेक प्रकार के पन्थ और सम्प्रदाय हैं, जिनमें रहकर लोग संन्यास व्रत धारण करते हैं। ऐसे लोग प्रायः भगवा वस्त्र पहनते हैं, जो त्याग और बलिदान का प्रतीक है। ऐसे ही एक संन्यासी थे स्वामी प्रेमानन्द, जिन्होंने संन्यास लेने के बाद समाज सेवा को ही अपने जीवन का ध्येय बनाया। वे पूजा पाठ एवं साधना तो करते थे; पर उनकी मुख्य पहचान परोपकार के कामों से हुई। स्वामी जी का जन्म 18 नवम्बर, 1930 को पंजाब के एक धनी एवं प्रतिष्ठित परिवार में हुआ। सम्पन्नता के कारण सुख-वैभव चारों ओर बिखरा था; पर प्रेमानन्द जी का मन इन भौतिक सुविधाओं की बजाय ध्यान, धारणा और निर्धन-निर्बल की सेवा में अधिक लगता था। इसी से इनके भावी जीवन की कल्पना अनेक लोग करने लगे थे। प्रेमानन्द जी का बचपन कश्मीर की सुरम्य घाटियों में बीता। वहाँ रहकर उनका मन ईश्वर के प्रति अनुराग से भर गया। वे अपने जीवन लक्ष्य के बारे में विचार करने लगे; पर उन्होंने शिक्षा की उपेक्षा नहीं की। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से इतिहास में और पंजाब विश्वविद्यालय से उर्दू में एम.ए किया। इसके बाद वे अनेक विश्वविद्यालयों में प्राध्यापक भी रहे; पर उनके लिए तो परमपिता परमात्मा ने कोई और काम निर्धारित कर रखा था। धीरे-धीरे उनका मन सांसारिक माया मोह से हट गया। वे समझ गये कि भौतिक वस्तुओं में सच्चा सुख नहीं है। वह तो ईश्वर की प्राप्ति और मानव की सेवा में है। उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी छोड़ दी और अपने आध्यात्मिक गुरु से संन्यास की दीक्षा ले ली। लोग उनके इस निर्णय पर आश्चर्य करते थे; पर अब उनके जीवन का मार्ग दूसरा ही हो गया था। स्वामी जी ने मानव कल्याण के लिए अनेक ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने हिन्दी में मानव जाग, जीव शृंगार; अंग्रेजी में आर्ट ऑफ़ लिविंग, लाइफ ए टेण्डर स्माइल तथा उर्दू में ऐ इन्सान जाग नामक पुस्तकें लिखीं। ये पुस्तकें आज भी अत्यन्त प्रासंगिक हैं; क्योंकि इनसे पाठकों को अपना जीवन सन्तुलित करने का पाथेय मिलता है। इन पुस्तकों में उनके प्रवचन भी संकलित हैं, जो सरल भाषा में होने के कारण आसानी से समझ में आते हैं। उनके लेखन और प्रवचन का मुख्य विषय विज्ञान और धर्म, विश्व शान्ति, विश्व प्रेम, नैतिक और मानवीय मूल्य, वेदान्त और जीवन की कला आदि रहते थे। उन्होंने साधना के बल पर स्वयं पर इतना नियन्त्रण कर लिया था कि वे कुल मिलाकर ढाई घण्टे ही सोते थे। शेष समय वे सामाजिक कामों में लीन रहते थे। 23 अपै्रल, 1996 को मुकेरियाँ (पंजाब) के पास हुई एक दुर्घटना में स्वामी जी का देहान्त हो गया। आज भी उनके नाम पर पंजाब में अनेक विद्यालय और धर्मार्थ चिकित्सालय चल रहे है। ........................................... 18 नवम्बर/जन्म-दिवस राममंदिर आंदोलन के निकटस्थ साक्षी : चम्पतरायजी 1947 के बाद भारत के हिन्दू नवजागरण में श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन की विशेष भूमिका है। इसने देश के धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य को बदल दिया। आंदोलन में सार्वजनिक मंचों पर वरिष्ठ साधु-संतों के साथ विश्व हिन्दू परिषद के श्री अशोक सिंहल सदा उपस्थित रहते थे; लेकिन पीछे रहकर सब योजनाओं को परिणाम तक पहुंचाने वाले चंपतरायजी इस आंदोलन के जीवंत कोष (एनसाइक्लोपीडिया) और निकटस्थ साक्षी हैं। चंपतजी का जन्म 18 नवम्बर, 1946 को नगीना (जिला बिजनौर, उ.प्र.) में कपड़े के कारोबारी श्री रामेश्वर प्रसाद बंसल और श्रीमती सावित्री देवी के घर में हुआ था। पिताजी संघ के कार्यकर्ता थे और 1948 के प्रतिबंध काल में जेल गये थे। दस भाई-बहिनों में चंपतजी का नंबर दूसरा है। बचपन से ही वे शाखा में जाते थे। रज्जू भैया, ओमप्रकाशजी, सूर्यकृष्णजी, सलेकचंदजी आदि प्रचारक घर आते रहते थे। पढ़ाई में तेज होने से 1969 में भौतिकी में एम.एस-सी. करते ही वे रोहतक (हरियाणा) के एक डिग्री काॅलिज में पढ़ाने लगे। 1972 में वे धामपुर (उ.प्र.) के आर.एस.एम. डिग्री काॅलिज में आ गये। यथासमय उन्होंने संघ के तीनों वर्ष के प्रशिक्षण पूरे किये। 1975 में देश में आपातकाल और संघ पर प्रतिबंध लग गया। चंपतजी बिजनौर में संघ के जिला कार्यवाह थे। अतः काॅलिज में ही पुलिस उन्हें पकड़ने आ गयी। चंपतजी उनके साथ घर गये। कुछ कपड़े लिये और माता-पिता के पैर छूकर जेल चले गये। ‘मीसा’ लगाकर उन्हें बरेली, आगरा और नैनी जेल में रखा गया। 1980 में नौकरी छोड़कर वे संघ के प्रचारक बने। देहरादून और सहारनपुर में जिला तथा 1985 में मेरठ के विभाग प्रचारक के बाद 1986 में वे विश्व हिन्दू परिषद (पश्चिमी उ.प्र.) के सह संगठन मंत्री बनाये गये। फिर वे उ.प्र. के संगठन मंत्री, केन्द्रीय मंत्री, संयुक्त महामंत्री, महामंत्री तथा उपाध्यक्ष बने। 1996 से केन्द्रीय कार्यालय, दिल्ली में रहकर वहां की व्यवस्था भी उन्होंने संभाली। 1990 के बाद मंदिर आंदोलन में तेजी आयी। उन दिनों चंपतजी का केन्द्र अयोध्या ही था। वहां की हर व्यवस्था उनके जिम्मे थी। इस दौरान वे वहां की हर गली, मोहल्ले और आश्रम के इतने पक्के जानकार हो गये कि लोग हंसी में उन्हें ‘अयोध्या का पटवारी’ कहते थे। आंदोलन ने उतार-चढ़ाव के कई दौर देखे। चंपतजी हर जगह पृष्ठभूमि में रहकर काम करते थे। व्यवस्था के हर पहलू पर उनकी पूरी पकड़ रहती थी। परिषद के काम से पूरे देश का प्रवास तो उन्होंने किया ही है। एक बार अशोकजी के साथ वे विदेश भी गये हैं। विज्ञान के छात्र होने के बावजूद वे लेखा कार्यों के भी तज्ञ हैं। विश्व हिन्दू परिषद का काम सैकड़ों न्यासों के माध्यम से चलता है। हर न्यास का प्रतिवर्ष आॅडिट होता है। केन्द्र में कांग्रेसी सरकारों ने हिसाब-किताब के नाम पर कई बार परिषद को घेरने का प्रयास किया; पर उनकी दाल नहीं गली। अयोध्या आंदोलन में लखनऊ से लेकर दिल्ली तक मुकदमों का लंबा दौर चला। यह जिम्मेदारी भी मुख्यतः चंपतजी पर ही थी। वे आंदोलन की हर फाइल और कागज को संभालकर रखते थे, जिससे उनके पक्ष के वकील उसे न्यायालय में सही समय पर प्रस्तुत कर सकें। मुकदमे के दौरान वे चुपचाप बैठकर बहस सुनते थे। मुकदमों की पैरवी देश के कई बड़े वकीलों ने निःशुल्क की। परिश्रम, सादगी और विनम्रता चंपतजी का विशेष गुण है। इसलिए वरिष्ठ वकील, साधु-संत और शासन-प्रशासन के लोग भी उन्हें बहुत मानते हैं। लम्बे संघर्ष के बाद अब सर्वोच्च न्यायालय से मंदिर के पक्ष में निर्णय आ चुका है। चंपतजी मंदिर निर्माण के लिए बने ‘श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र न्यास’ के महासचिव हैं। अब सबको उस दिन की प्रतीक्षा है, जब श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में श्रीरामलला के दिव्य विग्रह की स्थापना होगी। (पवन कुमार अरविंद : हिन्दुस्थान समा/3.3.20 तथा सुधीर बंसल) -------------------------------------------------------------------------------------- 18 नवम्बर/इतिहास-स्मृति अन्तिम सांस तक संघर्ष भारतीय वीर सैनिकों के बलिदान की गाथाएं विश्व इतिहास में यत्र-तत्र स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। चाहे वह चीन से युद्ध हो या पाकिस्तान से; हर बार भारतीय वीरों ने अद्भुत शौर्य दिखाया है। यह बात दूसरी है कि हमारे नेताओं की मूर्खता और समझौतावादी प्रवृत्ति ने रक्त से लिखे उस इतिहास को कलम की नोक से काट दिया। 18 नवम्बर 1962 को चुशूल में मेजर शैतान सिंह और उनके 114 साथियों का अप्रतिम बलिदान इसका साक्षी है। उत्तर में भारत के प्रहरी हिमालय की पर्वत शृंखलाएं सैकड़ों से लेकर हजारों मीटर तक ऊंची हैं। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में 13वीं कुमाऊं की ‘सी’ कम्पनी के 114 जवान शून्य से 15 डिग्री कम की हड्डियां कंपा देने वाली ठंड में 17,800 फुट ऊंचे त्रिशूल पर्वत की ओट में 3,000 गज लम्बे और 2,000 गज चौड़े रजांगला दर्रे पर डटे थे। वहां की कठिन स्थिति का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि चाय बनाने के लिए पानी को कई घंटे तक उबालना पड़ता था। भोजन सामग्री ठंड के कारण बिलकुल ठोस हो जाती थी। तब आज की तरह आधुनिक ठंडरोधी टैंट भी नहीं होते थे। उन दिनों हमारे प्रधानमंत्री नेहरू जी ‘हिन्दी-चीनी, भाई-भाई’ के नशे में डूबे थे, यद्यपि चीन की सामरिक तैयारियां और उसकी साम्राज्यवादी प्रवृत्ति देखकर सामाजिक रूप से संवेदनशील अनेक लोग उस पर शंका कर रहे थे। इनमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री गुरुजी भी थे। उस समय हमारे सैनिकों के पास शस्त्र तो दूर, अच्छे कपड़े और जूते तक नहीं थे। नेहरू जी का मत था कि यदि हम शांति के पुजारी हैं, तो कोई हम पर आक्रमण क्यों करेगा ? पर चीन ऐसा नहीं सोचता था। 18 नवम्बर 1962 को भोर में चार बजकर 35 मिनट पर चीनी सैनिकों रजांगला दर्रे पर हमला बोल दिया; पर उन्हें पता नहीं था कि उनका पाला किससे पड़ा है। मेजर शैतान सिंह के नेतृत्व में भारतीय सैनिक शत्रु पर टूट पड़े। उन्होंने अंतिम सांस और अंतिम गोली तक युद्ध किया। पल्टन के सब सैनिक मारे गये; पर चीन का कब्जा वहां नहीं हो पाया। कैसी हैरानी की बात है कि इस युद्ध का पता दिल्ली शासन को महीनों बाद तब लगा, जब चुशूल गांव के गडरियों ने सैनिकों के शव चारों ओर छितरे हुए देखे। सर्दियां कम होने पर जब भारतीय जवान वहां गये, तब पूरा सच सामने आया। भारतीय सैनिकों के हाथ बंदूक के घोड़े (ट्रिगर) पर थे। कुछ के हाथ तो हथगोला फेंकने के लिए तैयार मुद्रा में मिले। इसी स्थिति में वे जवान मातृभूमि की गोद में सदा के लिए सो गये। भारतीय सीमा में एक हजार से भी अधिक चीनी सैनिकों के शव पड़े थे। स्पष्ट था कि अपना बलिदान देकर 13वीं कुमाऊं की ‘सी’ कम्पनी ने इस महत्वपूर्ण चौकी की रक्षा की थी। चीन से युद्ध समाप्त होने के बाद मूलतः जोधपुर (राजस्थान) निवासी मेजर शैतान सिंह को परमवीर चक्र, आठ सैनिकों को वीर चक्र तथा चार को सेना पदक दिया गया। सर्वस्व बलिदानी इस पल्टन को भी सम्मानित किया गया। इस युद्ध की स्मृति में रजांगला में एक स्मारक बना है, जिस पर 114 सैनिकों के नाम लिखे हैं। पास में ही ‘अहीर धाम’ बना है, चूंकि उस पल्टन के प्रायः सभी सैनिक रिवाड़ी (हरियाणा) के आसपास के अहीर परिवारों के थे। इस बलिदानी युद्ध से प्रेरित होकर एम.एस.सथ्यू ने ‘हकीकत’ फिल्म बनायी, जो अत्यधिक लोकप्रिय हुई। (संदर्भ : जनसत्ता, 16.11.08) ..................................इस प्रकार के भाव पूण्य संदेश के लेखक एवं भेजने वाले महावीर सिघंल मो 9897230196


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