समाज अपने दायित्व को समझे अब चुप ना रहे मुकुल सक्सेना लेखिका

 


शिर्षक "बस अब चुप न रहे"



*लेखिका-निवेदिता मुकुल सक्सेना झाबुआ*


    इक्कस्वी सदी जहा भारत  आज  ज्ञान विज्ञान तकनीक की दुनिया मे  आगे बढता जा रहा वही कई बातो मे लगता हैं हम आगे बढ़ नही  पा रहे शायद दल दल मे धंसते जा रहे जहा। बच्चो के लिये प्रगतिवर्धक  बातो को अग्रसर करने की कोशिश कर रहे । वही कई बार लगता हैं वास्तविक स्वरूप पर्दे के विपरीत है । जहा बाल अधिकार व संरक्षण के लिये कई समितिया व जोन बने उतनी ही तेजी से बाल शोषण बडता जा रहा।खासकर बच्चियो को लेकर तीव्रता से बडती गम्भीर अपराधिक घटनाएँ।    

          कोरोना त्रासदी में  जनजीवन अस्त व्यस्त हुआ वही मानवीय मानसिकता का भी अपनी अपनी जगह अलग ही स्वरूप नजर आया । चलिये बडो की अपनी विकसित समझ ओर दायरा होता है,क्योकि वहा जिम्मेदारी का  भी बोध होता  हैं । लेकिन उसके विपरित होता है "एक अबोध बचपन " । जिसे कैसे भी मनाया या बहलाया जा सकता हैं , चाहे तो मन मर्जी की वस्तु देकर या डरा कर।   एक मासूम सा बचपन देख रेख ओर संरक्षण की छांव में हँसते खेलते बीत जाता हैं वही कई नन्ही कलियो का बचपन इन सबसे वंचित "बचपन" की राह टोहते दिखता है ।

       उस नन्ही बच्ची को पता तक नही कौन उसका अपना है। वो बोलती आँखें हंसता सा मटमेला चेहरा बिखरे बाल मेलि कुचेली फ्राक पहनी उम्र लगभग छः या सात साल कभी माता पिता के पास से, कभी बस जिसनें हाथ थामा जिसे अपना  समझना मजबुरी है कि  वही शायद मेरा खैर ख्वाह है। जब थोड़ा होश आया तो कचरा बीनते टटोलते टोलियो मे दिख जाती। शायद हम सब देखकर भी इन्हे नजरअंदाज कर देते क्योंकि हम समझते है क्या लेना देना इनकी जिन्दगी मे दखल देकर। ये हम सबके लिये आम बात हो सकती हैः लेकिन इन नन्ही बच्चियो को  हर संकट से जुझकर शाम तक कचरा पन्नी बेचकर पैसे घर लाकर देना मजबूरी होती है और यही खोता अनजान बचपन उनकी जीन्दगी है। 

     आर्थिक संकट कोरोना मे बीमारी की तरह पूरे विश्व मे फेला है। बात उनकी आती हैं जो इस आर्थिक संकट के चलते अपने बच्चो की जिन्दगी के साथ कब क्या घट रहा उसका अंदाजा भी नही लगा सके ,वही कई बच्चियाँ मानव तस्करी का शिकार हुई चाहे देह व्यापार या धर्म परिवर्तन के साथ बाल विवाह तक का शिकार हुई। कई बच्चियाँ शिक्षा प्राप्त करने के नाम पर बड़े घरो मे बंधुआ मजदूर के रुप मे बेच दी गयी। सैकडो नाबालिग इस समय गिरोह के साथ इन अवैध व्यापार में लिप्त है।


       बात जब बच्चियो के वर्तमान की हो रही तो यह बात छुपी नही कि हाल ही मे कई ढाई महिने या पाच दिन की बच्चियो के ब्लात्कार की खबरे देखी व पढी गयी लेकिन अपराधी को सजा कुछ खास नही मिल पाती जबकि पोक्सो ऐक्ट के तहत उन्हे इन गम्भीर अपराध के चलते फांसी या आजीवन कारावास तक का प्रावधान है।लेकिन न्याय जटिल प्रक्रिया के कारण मुश्किल से एक बच्ची को पूर्णत:प्राप्त नही हो पा रहा । 


      बहरहाल , दुख होता हैं तब जब नाबालिग बच्चिया बाल श्रमिक या बंधुआ मजदूरी के साथ शारिरीक व मानसिक शोषण से जूझती हुई परिवार का भरण पोषण करती दिखती है या माता पिता द्वारा जबर्दस्ती इस गर्त झौक दी जाती है ।अंचल के कुछ माता पिता अपने मतलब के लिए इन बच्चियो को गिरवी तक रख देते है। ये भी देखने मे आया कि कुछ मांए भी इन बच्चो को छोड अन्य्ंत्र चली जाती है व पिता इनकी खरीदी बिक्री से ऐश कर रहे ओर इन बच्चियो के श्रम के पैसो से अपना भरण पोषण करते नजर आ रहे। ये बच्चिया  शोषण का शिकार बन दिन भर मालिक के घर का काम करती है।गंभीर चिन्तन का विषय है छोटा सा कमजोर शरीर और बड़ो के सभी काम झाडू पोछा,खाना बनाना, कपडे धोना जैसे सभी कार्य आठ नौ साल की बच्ची करती है। शायद हम सभी ने ये मजबुरी वाले दृश्य कई बार देख कर भी नजरअंदाज कर देते हैं। जहा एक ओर सक्षम परिवारो मे बच्चियाँ हाथो हाथ पल रही वही दूसरे पलड़े में मजबुरी की पराकाष्ठा की कडी चुनौती का सामना इन नन्ही कलियो को करना पड़ रहा है।


        शायद ये अब तक की विडंबना है हमारे देश व अंचल की कई संरक्षण समिति व योजनाओ के बावजूद बच्चियाँ आज भी अपने अधिकारो से वंचित हैं व गम्भीर त्रासदी का शिकार दिन ब दिन होती जा रही। 

                      एक चाइल्ड ऐक्टिविस्ट के रुप मे पाया है कि लगतार  बच्चियों के धर्म परिवर्तन व बाल विवाह ओर बाल श्रम  के अप्रत्य्क्ष आंकड़े सर्वविदित रहे हैं जो छोटे ग्रामिण क्षेत्रो मे एक आम सी बात है। 

 

*जिम्मेदारी हमारी"


 बाल अधिकार की जिम्मेदारी न्याय पालिका से लेकर हम सबकी है जिसमें व्यक्तिगत, परिवार , समाज ,संस्थान सभी का स्वच्छ मन से मानवीय संवेदनाओं के साथ जागृत होकर सृष्टि की इन रचियताओ का ध्यान रखना अतिआवश्य्क हैं।  

        अन्याय देख चुप ना रहे चाहे बच्चा हमारा ना हो वह देश का उज्जवल भविष्य है उसका संरक्षण हमारी जिम्मेदारी हैं।हमारा मौन या निष्क्रिय रहना हमारे समाज पर कुठाराघात साबित होगा जिसके जिम्मेदार हम प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से होंगे क्योंकि फिर चिड़िया चुग गयी खेत की स्थिति न आये।

प्रस्तुति रिपोटर चंद्रकांत सी पूजारी

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